कृष्ण भगवान विष्णु के शाश्वत अवतार

कृष्ण भगवान विष्णु के शाश्वत अवतार हैं। जिन्होंने धरती पर अपनी 16 कलाओं के साथ अवतार लिया था। जबकि भगवान विष्णु के दूसरे अवतार राम हैं जिन्होंने 8 कलाओं के साथ अवतार लिया।। जिस कारण भगवान कृष्ण बहुत ही चंचल और मनोहारी थे तथा भगवान राम मर्यादित पुरुष थे। जबकि श्री कृष्ण प्रेमी और चंचल स्वभाव के थे। जो बचपन में अपने मित्रों के साथ लोगों के घरों में माखन की चोरी भी किया करते थे।

 






जबकि भगवान राम मर्यादित पुरुष थे। जिन्होंने मानव के लिए श्रेष्ठ मर्यादाओं का निर्माण किया। जो खुद मर्यादा पुरुषोत्तम थे। जिन्होंने कभी अपने माता पिता और गुरुओं की बात मानने से इंकार नहीं किया। जिन्होंने पिता के कहने पर 14 वर्ष का बनवास काटा और गुरु के कहने पर रक्षासी ताड़का का वध भी किया। 

जबकि भगवान कृष्ण 16 कलाओं से पूर्ण होने के कारण, वो इन मर्यादाओं में बंधे हुए नहीं थे। एक बार जब जरासंध के साथ युद्ध चल रहा था। तब उन्होंने अपनी नगरी के लोगों को बचाने के लिए वह युद्ध क्षेत्र को छोड़कर भाग गए थे। फ़िर उन्होंने पुरी मथुरा सहित गुजरात में समुद्र तट पर अपनी द्वारिका पुरी का निर्माण किया। इस तरह युद्ध क्षेत्र को छोड़ने पर भगवान कृष्ण रणछोड़ दास भी कहलाए। 

वह भगवान राम की तरह मर्यादाओं में बंधे हुए नहीं थे। क्यों भगवान राम ने जब अवतार लिया था तब धर्म का उतना नाश नहीं हुआ था। इसलिये भगवान राम ने मर्यादा में रहकर सभी राक्षसों और पापियों का नाश किया।

जब भगवान कृष्ण ने अवतार लिया था तब धरती पर अधर्म अधिक ज्यादा हो चुका था। और धर्म का नाश ज्यादा मात्रा में हो चुका था। इसलिय इस युग में भगवान राम के युग की  मर्यादाओ का कोई स्थान ही नहीं रहा था। चारों तरफ अधर्म का बोलबाला था। लोग मर्यादाओं का कहीं पर भी पालन नही करते थे। 

इसलिए भगवान कृष्ण ने भी अपनी सभी कलाओं का प्रयोग करते हुए। सभी राक्षसों और पापियों का संहार किया। 

भगवान कृष्ण की माया का सबसे अच्छा उदाहरण। जब कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन ने अपने पुत्र के हत्यारे को मारने की सौगंध ली और कहा कि आज शाम सूरज ढकने से पहले सिंधु नरेश ज्याद्रथ का वध नहीं कर पाया। तो वह अग्नि में में अपनी आहूति दे देगा। 

लेकिन शाम होने वाली थी और ज्याद्रथ कहीं भी दिख नहीं रहा था। तब भगवान कृष्ण ने अपनी माया से काम लिया और सूरज को कुछ समय के लिए छुपा दिया। जिससे ज्याद्रथ वहां आ पहुंचा। जहां अर्जुन आग में कूदने वाला था। इसी समय श्री कृष्ण ने माया से अपना प्रभाव सूरज से हटाने को कहा और इसी समय अर्जुन ने सूरज को देखा। जो अस्त नहीं हुआ था। ठीक समय देख कर अर्जुन ने उसका संहार कर दिया। इस घटना चक्र में श्री कृष्ण की लीला और छल ही था। क्यों कि वो 16 कलाओं से पूर्ण पुरुष थे। 

उनके पास भगवान विष्णु के सभी अस्त्र शस्त्र निहित थे। उनके सबसे प्रमुख सुदर्शन चक्र था। जिससे उन्होंने अपने चचेरे भाई शिशुपाल का भी संहार किया था। जिसको उन्होंने 100 गलतियों की छूट दे रखी थी और जैसे ही 101 गलती हुई। उन्होंने उसका तुरंत वध कर दिया।

साथ में उन्होंने सभी दुष्ट कोरवों का भी सभी पांडवों के हाथों वध करवा दिया और उनके पाप में साथ देने वाले दादा, भाई और मित्र को भी मृत्यु लोक भेज दिया। 

उन्होंने अपने अवतार के अंत में माता गांधारी के श्राप को पूर्ण करने के लिए, उन्होंने अपने सभी अहंकारी यादवों का भी वध करवा दिया और सम्पूर्ण द्वारिका पुरी को समुद्र में डूबा दी।

अंत मे वो भी फिर से वैकुंठ लोक की ओर पधार गए। क्यों कि उनके धरती लोक k छोड़ने के साथ ही कलयुग का युग प्रारंभ होता। उनके मृत्यु लोक में अधिक ओर रहने से समय चक्र में बदलाव होता। 

      

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