भारत ने एक डील से श्रीलंका में चीन के मंसूबों को समुद्र में मिला दिया

भारत ने श्री लंका के साथ अपनी 700 मिलियन डॉलर की डील से चीन के सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया। भारत और जापान ने इस डील को करने के लिए श्री लंका से बहुत मिन्नते की। लेकिन चीन के दबाव के कारण श्रीलंका इस डील को करने से पीछे हट जाता था। श्री लंका भी यहां जापान के कारण थोड़ा झिझक महसूस कर रहा था क्यों कि जापान और चीन की सीधे बनती नहीं है। इसलिए भी यह डील हों नहीं रही थी। जबकि भारत के लिए श्री लंका में चीन को काउंटर करना बहुत ही जरूरी था। 





मुख्य खबरें

1. भश्री लंका की डील के बारे में विस्तार से वर्णन।
2. भारत के लिए यह डील क्यों जरूरी थी और कैसे चीन को भारत ने वर्षो पीछे छोड़ दिया।

3. चीन की भारत के खिलाफ़ "स्ट्रिंग ऑफ पर्ल" वाली साजिश।

 4. भारत के प्राइवेट सेक्टर की ताकत दर्शाती यह डील।

भारत और श्रीलंका की इस डील का सबसे बड़ा कारण चीन ही है। क्यों कि चीन की श्री लंका में उपस्थिति भारत की सुरक्षा के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। इस डील को फाइनल करने का सबसे बड़ा तात्कालिक कारण चीन की पूरे कोलंबो बंदरगाह पर अपना प्रभाव बनाना था। क्योंकि चीन श्री लंका के दूसरे कोलंबो बंदरगाह के मुख्य दक्षिणी कंटेनर टर्मिनल को श्री लंका बंदरगाह विकास प्राधिकरण से 500 मिलियन डॉलर में करीब 50 वर्षों के लिए ले लिया था। अब इस तरह से चीन के हाथों में श्री लंका का दूसरा महत्त्वपूर्ण बंदरगाह को जाता देख।  भारत सरकार के लिए बहुत ही कठिन परिस्थिती आ गई। क्यों कि इस तरह चीन का हंबनटोटा बंदरगाह और कोलंबो बंदरगाह की पूरी समुद्र तट रेखा पर प्रभुत्व स्थापित हो जाता। इसलिए भारत सरकार ने भी चीन को काउंटर करने के लिए बहुत बड़ा दाव चला और कोलंबो बंदरगाह के वेस्टर्न अंतरराष्ट्रीय कंटेनर टर्मिनल (CWICT)  की डील को भारत ने चीन से बड़ा मूल्य 700 मिलियन डॉलर देकर कर ली। अब भारत सरकार ने यहां अपनी सरकारी कंपनी का पैसा नहीं लगाया है। यहां भारत सरकार ने अपने प्राइवेट सेक्टर के अरबपति गाैतम अडानी समूह को आगे कर दिया और यह डील भारत के अरबपति गौतम अडानी और श्री लंका बंदरगाह विकास प्राधिकरण के बीच हो गईं। जिसके बदले में गौतम अडानी को कोलंबो बंदरगाह के वेस्टर्न अंतरराष्ट्रीय कंटेनर टर्मिनल में 51% हिस्सेदारी प्राप्त हो गईं और अब गौतम अडानी समूह इस टर्मिनल का रखखाव व विकास करेगा। गौतम अडानी समूह को कोलंबो बंदरगाह के वेस्टर्न अंतरराष्ट्रीय कंटेनर टर्मिनल "बनाओ चलाओ और हस्तांतरण (BOT)" की नीति पर 35 वर्षों के लिए मिला है। श्री लंका बंदरगाह विकास प्राधिकरण के अनुसार बनाओ चलाओ और हस्तांतरण की नीति के आधार श्री लंका के पोर्ट सेक्टर के क्षेत्र में 700 मिलियन डॉलर का सबसे बड़ा निवेश है। 

भारत के गौतम अडानी समूह और श्रीलंका बंदरगाह विकास प्राधिकरण के बीच इस डील को फाइनल कराने में भारत के  श्रीलंका में राजदूत गोपाल बांगले ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जो डील के साइन होने के समय भी मौजूद रहें थे। 





जब चीन के पास कोलंबो बंदरगाह का एक मुख्य टर्मिनल चला गया। तब भारत सरकार को वास्तविक खतरे का आभास हो गया था। इसलिए कोलंबो बंदरगाह के वेस्टर्न अंतरराष्ट्रीय कंटेनर टर्मिनल की डील बहुत जरूरी हों गई थी। आप इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि भारत कोलंबो बंदरगाह के लिए इतना ज्यादा चिंतित था। कि इस डील को करने के लिए भारत ने चीन से 200 मिलियन डॉलर अधिक श्री लंका बंदरगाह विकास प्राधिकरण को दिये। अब इस डील से चीन के नौसेनिक अड्डा बनाने के सारे मंसूबे धरे के धरे रह गए हैं। चीन अब केवल हंबनटोटा और कोलंबो बंदरगाह के दक्षिणी कंटेनर टर्मिनल पर व्यापार ही कर सकता है। इससे ज्यादा वह अपनी गतिविधियों को बढ़ावा नहीं दे सकता है। क्यों कि अब श्री लंका के मुख्य समुद्र तटीय क्षेत्र में इस डील से उपस्थिति हो गई है। 

SLPA के अध्यक्ष– कैप्टन निहाल केपेटीपोला और प्रबंध निदेशक श्री उपुल जयतिसा ने श्रीलंका पोर्ट्स अथॉरिटी (SLPA) की ओर से समझौते पर हस्ताक्षर किए। स्थानीय भागीदार जॉन कील्स होल्डिंग्स इसके अध्यक्ष कृष्ण।

चीन भारत को हिंद महासागर में चारों तरफ से घेरना चाहता है। जिसके लिए उसने पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह को अपने हाथों में ले लिया। इसके साथ ही हिंद महासागर के दूसरे छोर "जिबूती" में चीन ने अपना सैन्य बेस स्थापित कर लिया है। म्यांमार और बांग्लादेश में चीन अपनी पकड़ बनाने के लिए अपनी कर्ज पॉलिसी का इस्तेमाल कर रहा है।इस तरह से चीन भारत को हिंद महासागर में चारों तरफ से घेराने का प्लान बना रहा है। जिसको सामान्य भाषा में "स्ट्रिंग ऑफ पर्ल" भी कहते हैं। चीन भारत पर तभी चारों तरफ से घेर सकता था। चीन भारत को तभी चारों तरफ से घेर सकता था। जब श्री लंका उसके वश में होता। चीन ने श्री लंका को अपने पाले में लाने के लिए उसको कर्ज पर कर्ज दिया। लेकिन जब कर्ज लौटाने की बारी आयी। तब तक श्री लंका चीन के जाल में बुरी तरह से फंस गया। जिसके बाद श्री लंका सरकार ने मजबूर होकर अपना हंबनटोटा बंदरगाह चीन को 99 वर्षो के लिए देना पड़ा। इस हंबनटोटा बंदरगाह का स्वामित्व चीन के पास जाना ही भारत के लिए सुरक्षा का खतरा 1000 गुना बढ़ गया। क्यों कि भारत के दक्षिणी हिस्से से श्री लंका की दूरी महज 30 से 40 किलोमीटर ही है। 


अब श्री लंका के साथ भारत की यह डील श्री लंका से सुरक्षा खतरे को काफी हद तक कम कर देगी। क्यों कि चीन अगर श्री लंका में कोई भी गलत हरकत करता है तो भारत की सरकार कोलंबो बंदरगाह के वेस्टर्न कंटेनर टर्मिनल से आसानी से पकड़ लेगी

भारत में कुछ लोग हमारे उद्योगपतियों के लिए बहुत ही अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल करते हैं। जबकि भारत के विकाश और भारत की सुरक्षा के लिए प्राइवेट सेक्टर मील की कड़ी साबित होगा। क्योंकि भारतीय सरकारी कंपनियों का हाल सब कोई जानता है कि कैसा है। जो सिर्फ और सिर्फ भारत सरकार और टैक्सपेयर्स के ऊपर बोझ हैं। हम एयर इंडिया को ही देख सकतें हैं। सरकार बार बार एयर इंडिया में पैसा लगाकर धक गईं। तब भी एयर इंडिया की माली हालत नहीं सुधरी। अब धक हार कर सरकार ने एयर इंडिया को बेचाने का निर्णय लिया है। इस समय एयर इंडिया पर 60,000 करोड़ रूपए का कर्जा है और यदि सरकार कुछ समय ओर एयर इंडिया को चलाती। तो उसे अपनी बड़ी पूंजी एयर इंडिया में लगानी पड़ती। लेकिन कब तक एक न एक दिन एयर इंडिया को बेचना ही पड़ता। 

जबकि दूसरी भारत का प्राइवेट सेक्टर भारत को दिन दूनी रात चौगुनी विकाश की श्रेणी छुआ रहा है। जिस पर हर भारतीय को गर्व महसूस करना चाहिए। जब भारतीय प्राइवेट कंपनियां मजबूत होंगी। तो भारत भी विदेशों में श्री लंका की तरह मजबूत बनेगा। तब भारत की प्राइवेट कंपनियां भारत की कमजोरी नहीं ताकत बनेगी। इसलिए हर भारतीय को पुराने जमाने से बाहर आकर अपनी प्राइवेट कंपनियां का समर्थन और उन पर गर्व करना चाहिए। 

श्री लंका में गौतम अडानी समूह का निवेश भारत की ताकत बना। जिसने भारत की सुरक्षा चिंताओं को भी काफी हद तक कम कर दिया। इसलिए भारतीय कम्पनियों का मजबूत होना। मतलब भारत का मजबूत होना है।

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