जब एक राजनेता देश को कुछ दे नहीं पाता, तो वह तुर्की के राष्ट्रपति एरदोगन की तरह कार्य करने लगता

हम सब अच्छे से जानते हैं कि जब एक राजनेता अपने देश को कुछ अच्छा करके नहीं दे पाता है तो वह अपने देश को उस रास्ते पर ले जाता है। जहां सिर्फ और सिर्फ देश की बर्बादी लिखी होती है। 

इसी तरह का काम तुर्की के वर्तमान राष्ट्रपति रिसेप तैय्यब एरदोगन कर रहे हैं। उन्होंने अपने देश को कुछ भी अच्छा कार्य करके नहीं दिया है। जैसेकि टर्किश इकोनॉमी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। लेकिन एरदोगन ने अपनी जनता की नजर उनकी सरकार की विफलताओं से हटाने के लिए तुर्की में कट्टर इस्लामवाद, कट्टरपंथ और शरिया क़ानून को बढ़ावा दे रहें हैं। जिसका सबसे बड़ा उद्धहरण "हाया शोफिया" संग्रहालय है। जिसको संग्रहालय से मस्जिद में बदल दिया। राष्ट्रपति एरदोगन की सनक का नतीज़ा है कि वह ओटोमन साम्राज्य के सपने अपनी जनता को दिखा रहें हैं। जबकि पूरी दुनिया जानती है कि तुर्की के राष्ट्रपति का यह सपना कभी भी सच नहीं होने वाला है। तब भी वह अपनी टर्किश आम जनता को इसके हसीन सपने दिखा रहे हैं। जिसकी सबसे बड़ी वजह है कि एरदोगन तुर्की के राष्ट्रपति के रुप में एक विफल व्यक्ति बनके उभरे हैं। जिनके शासन में तुर्की की इकोनॉमी और दूसरे देशों से तुर्की के संबंध बिगड़ गए हैं। जिसका खामियाजा तुर्किश आम जनता भुगतेगी।

तुर्की के राष्ट्रपति ने अभी कुछ दिनों पहले एक ऐसा निर्णय लिया है। जिससे तुर्की के पश्चिमी शक्तिशाली देशों से संबंध बिगड़ सकतें हैं। 




राष्ट्रपति एरदोगन का तुर्की के लिए आत्मघाती कदम

तुर्की के राष्ट्रपति ने हाल में 10 देशों के राजदूतों को देश से बाहर निकालने का आदेश दिया। जिनमें अमेरिका, जर्मनी, कनाडा और ब्रिटेन जैसे शक्तिशाली देशों के राजदूत हैं। जिनका पूरी दुनिया में अपना एक अलग प्रभुत्व स्थापित हैं और एक तरफ तुर्की जो सैन्य सैन्य और इकोनॉमी के तौर पर बहुत ही कमजोर देश है। तुर्की कभी भी इन 10 पश्चिमी देशों के सामने नहीं टिक सकता है और कहीं इन 10 देशों ने भी तुर्की का वहिष्कार कर दिया। तो तुर्की दुनिया में अकेला पड़ सकता है। क्योंकि तुर्की के राष्ट्रपति ने अकेले इन 10 देशों से ही पंगा नहीं लिया। बल्कि तुर्की ने बहुत से दूसरे देशों से भी पंगे ले रखें हैं। कश्मीर मामले पर राष्ट्रपति एरदोगन के बड़बोले बोलो ने तुर्की और भारत के संबंधों को पटरी से उतार दिए हैं। इसलिए भारत भी तुर्की को सबक सिखाने के लिए एक मौके की तलाश में हैं और मुझे लगता है कि तुर्की ने अमेरिका सहित 10 देशों के राजदूतों को निकालकर भारत को एक मौका दे दिया है। 



तुर्की के राष्ट्रपति एरदोगन के इन मूर्खता पूर्ण कार्यों का भुगतान तुर्की की आम जनता और वहां की अर्थव्यवस्था करेगी। तुर्की की अर्थव्यवस्था पहले से ही गर्त में जा रहीं है।राष्ट्रपति एरदोगन का पश्चिमी देशों के 10 राजदूतों को निकालने का उनका यह आदेश तुर्की की मरती अर्थव्यवस्था के लिए आखिरी कील साबित होगी। क्यों कि यह सभी पश्चिमी देश तुर्की की इस गुस्ताख़ी को बर्दास्त नहीं करेंगे। वह भी तुर्की के खिलाफ सख्त कार्रवाई आवश्य करेंगे। 


10 देशों के राजदूतों को निकालने का कारण

तुर्की में एक गुप्त संगठन है जिसका नाम पीस एंड होम काउंसिल है। जिसका निर्माण केवल यह सुनिश्चित करने के लिए हुआ है कि तुर्की एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और इस्लामिक कट्टरपंथ से दूर रहें। लेकिन तुर्की में राष्ट्रपति एरदोगन के आने के बाद तुर्की की धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक व्यवस्था की छवि में बहुत बडी गिरावट आई। जिसको देखकर इस संगठन में शामिल सैन्य अधिकारियों ने 2016 में तुर्की में राष्ट्रपति एरदोगन का तख्तापलट करने की कोशिश की थी। जोकि  विफल रहा था और सभी सैन्य अधिकारियों को टर्किश सरकार ने पकड़ लिया। 

तुर्की सरकार ने तख्तापलट में शामिल सैन्य अधिकारियों के अलावा कुछ व्यापारियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओ को बिना मुकदमा के पकड़ कर जेल में डाल दिया। इन पकड़े गए लोगों में ईरान में जन्मे ओसमान कवाला हैं। जोकि तुर्की में अपना व्यापार करते थे। लेकिन तुर्की के राष्ट्रपति एरदोगन के अनुसार ओसमान कवाला ने सैन्य अधिकारियों को तुर्की सरकार के खिलाफ भड़काया और उन्हें राष्ट्रपति एरदोगन सरकार का तख्तापलट करने के लिए प्रेरित किया।


जबकि पश्चिमी देशों ने तुर्की सरकार पर आरोप लगाया है कि टर्किश सरकार ने ओसमान कवाला को 3 वर्षों से बिना किसी मुकदमें से जेल में बंद कर रखा है। इन सभी देशों ने ओसमान कवाला के बहाने टर्किश न्यायपालिका पर प्रश्न चिन्ह उठा दिए।


इसी मामले पर पश्चिम के 10 देशों ने अपने एक संयुक्त बयान जारी किया और उसमें उन्होंने ओसमान कवाला को जेल से रिहा करने की मांग की थी। इस बयान में अमेरिका, जर्मनी, कनाडा, स्वीडन , न्यूजीलैंड सहित सभी 10 देशों ने यह भी कहा था कि यदि टर्किश सरकार ओसमान कवाला को रिहा नहीं करती है तो उन पर एक उचित मुकदमा दायर कर कोर्ट में पेश करना चाहिए। ताकि दुनिया को भी पता चलें कि ओसमान कवाला को टर्किश सरकार ने किस जुर्म में 3 वर्ष से जेल में बंद रखा है। 

लेकिन टर्किश सरकार ने सभी पश्चिमी 10 देशों की मांग पर उत्तर दिया और वह उत्तर इन सभी 10 देशों के राजदूतों को तुर्की से बाहर निकालने का था। राष्ट्रपति एरदोगन ने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि यह सभी देश ओसमान कवाला के मामले में चुप रहें अन्यथा इन सभी देशों के राजदूतों को देश से तुर्की से बाहर निकाल दिया जायेगा। 


तुर्की के राष्ट्रपति अब तुर्की को पश्चिमी देशों से हटाकर चीन, रूस के साथ लाना चाहते हैं। उनकी इन्हीं हरकतों के कारण आज तुर्की और नाटो देशों से संबंध खराब होते जा रहे हैं। जिसका असर टर्किश लोगों और तुर्की की इकोनॉमी पर पड़ना स्वाभाविक है। क्योंकि सभी पश्चिमी देश आर्थिक तौर पर मजबूत देश हैं। जबकि चीन को छोड़ दे तो रूस एक आर्थिक तौर पर कमजोर देश है। जो तुर्की को उसकी आर्थिक हालत में सुधार करने के लिए कुछ नहीं कर सकता है। जिसके लिए तुर्की को चीन से हाथ मिलाना होगा। चीन तुर्की मदद करेगा लेकिन अपनी शर्तों पर करेगा। पूरी दुनिया जानती है कि चीन की ज्यादातर शर्तें गोपनीय होती हैं। इसलिए तुर्की के पास ज्यादा कोई विकल्प मौजूद नहीं हैं। जो तुर्की की ख़त्म होती अर्थव्यवस्था को संजीवनी बूटी प्रदान कर सकें। 


तुर्की की इकोनॉमी भाग्य 2023 के चुनाव से निश्चित होगा। क्योंकि तुर्की आज FATF की ग्रे लिस्ट में शामिल हो चुका है और तुर्की की मुद्रा लीरा लगातार निचे गिर रहीं है। जिससे तुर्की के राष्ट्रपति एरदोगन की स्थिति तुर्की में लगातार कमजोर होती जा रही है और इन्हीं सब कारणों से उनकी सनक में भी वृद्धि हो रही है। जिनसे वह निर्णय ले रहें हैं। जो तुर्की के लिए कतई फायदेमंद साबित नहीं होगे। बल्कि इन निर्णयों से तुर्की दुनिया में अकेला पड़ सकता है। 

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