आखिरकार एयर इंडिया की घर वापसी हो गई, एयर इंडिया की स्थापना से लेकर सरकारी करण और पुनः घर वापसी की महत्वपूर्ण इनसाइड स्टोरी

आखिरकार भारत की सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया को उसका खरीददार मिल ही गया। एयर इंडिया को भारत के जाने माने उद्योगपति रतन टाटा ने 18,000 करोड़ की बोली लगाकर खरीद लिया है। इस महत्वपूर्ण डील को लोग एयर इंडिया की घर वापसी कह कर भी संबोधित कर रहे हैं। 


मुख्य केंद्र बिंदु

1. सरकार ने एयर इंडिया को बेच दिया।
2. एयर इंडिया की एक बार पुनः घर वापसी हो गई।
3. एयर इंडिया की स्थापना से लेकर वर्तमान तक की कहानी।
4. एयर इंडिया के कर्ज के बारे में जानकारी।

आज एयर इंडिया की खरीद की प्रक्रिया पूरी हो जानें के बाद रतन टाटा ने भी ट्वीटर पर ट्वीट कर लिखा है कि एयर इंडिया का पुनः वापस आने पर अभिनंदन है। जिसमें उन्होंने जेआरडी टाटा की एयर इंडिया के विमान के साथ एक फोटो भी शेयर की है। रतन टाटा एयर इंडिया की घर वापसी पर बहुत ही ज्यादा खुश प्रतीत हो रहे हैं। क्यों कि इसकी स्थापना रतन टाटा के पूर्वज जेआरडी टाटा ने की थीं। एयर इंडिया की जहां से शुरुआत हुई थी। आखिर में उसकी लैंडिंग पुनः जेआरडी टाटा के घर में ही हुई।

    

एयर इंडिया की स्थापना मुम्बई में सन् 1932 को हुई थी। एयर इंडिया के संस्थापक भारत के विख्यात उद्योगपति जहांगीर रतनजी दादाभाई (जेआरडी) टाटा हैं। जिन्होंने एयर इंडिया की नींव रखी थी। एयरलाइंस पहले एक क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर ही सेवारत थी। जो अपनी सेवाएं मद्रास, अहमदाबाद और कराची में दिया करती थी।  लेकिन 1939 में एयर इंडिया ने अपनी सेवाओं और कार्य क्षेत्र में वृद्धि की। जिसने त्रिवेंद्रम , दिल्ली और कोलंबो को  भी हवाई क्षेत्र से जोड़ दिया। वर्तमान में एयर इंडिया का मुख्यालय मुम्बई मे है। एयर इंडिया की  स्थापना से लेकर वर्तमान समय तक इसका मुख्यालय मुम्बई में ही रहा है।

भारत के इतिहास में जेआरडी टाटा ने 15 अक्टूबर 1932 को अमर बना दिया। इसी 15 अक्टूबर के दिन एयर इंडिया (भूत काल की टाटा एयरलाइंस) ने अपनी पहली उड़ान कराची की हवाई पट्टी से मुंबई के जुहू हवाई पट्टी तक भरी थी। जिसका संचालन खुद जहांगीर रतनजी दादाभाई (जेआरडी) टाटा कर रहें थे।


भारत की इस महान कंपनी के एयर इंडिया बनने की कहानी भी बहुत ही दिल को छू लेने वाली है।  स्थापना के शुरुआती वर्षों में एयर इंडिया टाटा एयरलाइंस के नाम से जानी जाती थी। लेकिन दुनिया के सबसे घातक दूसरा विश्व युद्ध  सन 1946 में ख़त्म हो जानें के बाद "टाटा एयरलाइंस" का नाम "एयर इंडिया" रख दिया गया। जिसको वर्तमान समय में एयर इंडिया के नाम से ही जाना जाता है। हालाकि इसके बाद एयर इंडिया एक पब्लिक कंपनी व एयर इंडिया लिमिटेड कंपनी बन गई थी। जो 1946 में बड़े पैमाने पर पूरे देश में अपनी सेवाएं दे रही थी। एयर इंडिया लिमिटेड कंपनी बनने के 2 वर्षों बाद ही यह "अंतरराष्ट्रीय एयर इंडिया लिमिटेड" में बदल गई। जिसने पहली बार अंतरराष्ट्रीय उड़ाने केरियो , जेनेवा और इंग्लैंड के लिए शुरु की थीं।

 

आजादी के बाद भारत सरकार हर बड़े संस्थान का "सरकारी करण" कर रही थी। एयर इंडिया भी दूसरी कंपनियों की भांति प्राइवेट हाथों से निकलकर सरकारी हाथों में आ गई थी। जिसके बदले में एयर इंडिया के मालिक टाटा को कुछ धन दे दिया गया। एयर इंडिया का सरकारी करण सन् 1953 में हुई थी। जिसमें दो भाग बनाये गए थे। एयर इंडिया का एक हिस्सा घरेलू उड़ानों को देखता था और जबकि दूसरा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को देखता था।  जो  निगम घरेलू उड़ानों को देखता था वह "इंडियन एयरलाइन्स निगम" कहलाता था। दूसरा निगम जो अंतरराष्ट्रीय उड़ाने संचालित किया करता था। वह "एयर इंडिया इंटरनेशनल निगम" कहलाया।


एयर इंडिया के सरकारी करण के दौरान बनाए गए दोनों निगमों का विलय सन् 2007 में एयर इंडिया में कर दिया।  जिसमें एयर इंडिया की घरेलु और क्षेत्रिय उड़ानों को मिला दिया गया था। जिससे यह सीधे एयर इंडिया में बदल गई। इस सरकारी विमानन कंपनी को भारत के लोग बहुत ही सम्मान से देखा करते थे। क्यों कि एयर इंडिया ने भारत के हजारों लाखों लोगों की संकट के समय मदद भी की थीं और संकटग्रस्त क्षेत्रों से भारतीय लोगों को वहां से निकाला भी था। जिससे हर भारतीय इससे जुडकर गर्व महसूस किया करता था।


लेकिन सरकारी संरक्षण ने इसकी नैया पार लगाने बजाय डूबा दी। जो एयर इंडिया कभी भारत सरकार के लिए कुबेर के खजाने की तरह कार्य किया करती थी। एक समय था जब एयर इंडिया हमेशा लाभ में रहा करती थी। हालाकि अब एयर इंडिया भारत की सरकार और जनता के लिए बोझ बन गई है। क्यों कि 2007 में घरेलू उड़ानों को अंतरराष्ट्रीय एयर इंडिया निगम के साथ जोड़ देने से यह हानि में जानें लगीं। एयर इंडिया पर 31 मार्च 2019 तक कुल कर्ज 60,074 करोड़ हो गया था। भारत सरकार ने कंपनी पर बढ़ते कर्ज को देखकर इसको बेचने मे ही भलाई समझी। क्योंकि सरकार इसको ऑपरेशनल बनाए रखने के लिए अपना धन का बहुत बड़ा हिस्सा लगाना पड़ता था। जबकि एयर इंडिया के कर्ज से मुक्ति नहीं मिली। जबकि कर्ज बढ़ता ही चला गया। इसलिए सरकार ने 2018 में पहली बार 76% की बिक्री के लिए बोली लगाने वाले लोगों को आमंत्रित किया। लेकिन इस बोली लगाने वाली प्रक्रिया कोई शामिल ही नहीं हुआ था। क्यों कि सरकार यहां अपनी चालाकी दिखा रहीं थीं। सरकार कंपनी में बोर्ड की सदस्यता के साथ 24% हिस्सेदारी रखना चाहती थी। जब सरकार ने देखा कि बोली लगाने वाला कोई नहीं आया। तब सरकार ने  एयरलाइंस में 100% बिक्री के साथ व डील को अच्छा बनाने के लिए कर्ज  के 62,000 करोड़ रूपए में से लगभग 23,286 करोड़ रूपए तक की छूट भी दे दी।

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