जर्मनी ने भारत को 10,000 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद दी, जर्मन राजदूत वोले भारत के बिना दुनिया किसी भी समस्या से छुटकारा नहीं पा सकती।

जर्मनी दुनिया का अकेला विकसित देश ही है। जो जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से ले रहा है। जिसने ग्लासगो में हुए Cop 26 वैश्विक जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के वादों को पूरा कर रहा है। जो वादें सभी विकसित देशों ने गरीब और विकासशील देशों से किए हैं। जिसके लिए उसने विकासशील देशों की आर्थिक मदद करने के लिए बड़ा क़दम उठाया है। 


जर्मनी की जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए आर्थिक सहायता

जर्मनी ने भारत को 1.3 बिलियन यूरो (10,000 करोड़ रुपए) की बड़ी आर्थिक मदद दी है। जिससे भारत जलवायु परिवर्तन से लड़ सकें और अपनी बिजली जरूरतों को कोयले से हटाकर हरित ऊर्जा भर निर्भर हो सकें।



जर्मनी ने भारत को दी राशि को तीन हिस्सों में बांटा है। जर्मनी ने 713 मिलियन यूरो शहरी विकास , 409 मिलियन यूरो कृषि विज्ञान  और 90 मिलियन यूरो प्राकृतिक संसाधनों के लिए आवंटित किए हैं। इन सबका उद्देश्य भारत में सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए भारत के लक्ष्यों का समर्थन करना है।


इस मसले पर जर्मनी के भारत में राजदूत ने कहा कि Cop 26 में, भारत और जर्मनी कोयले से बिजली उत्पादन को चरणबद्ध तरीके से बंद करने पर सहमत हुए। जर्मनी 2038 तक कोयले से बिजली उत्पादन को बंद कर देगा। जबकि भारत अभी जलवायु निवेश कोष द्वारा वित्त पोषित  और जर्मनी द्वारा समर्थित एक बहुपक्षीय कोयला उन्मूलन कार्यक्रम में शामिल है। जिसके लिए भारत ने 2027  तक सेवानिवृत्ति के लिए 50 गीगावाट के कोयला की संयंत्रों की पहचान कर ली है। 

पाकिस्तान और नेपाल को भी आर्थिक

जर्मनी ने भारत के अलावा पाकिस्तान और नेपाल को भी जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए आर्थिक मदद दी हैं। जर्मनी ने पाकिस्तान को 150 मिलियन यूरो की आर्थिक मदद जलवायु पर साझेदारी के तहत दी है। जलवायु परिवर्तन के अंतर्गत प्राप्त होने वाली पहली आर्थिक मदद है।


नेपाल को भी जर्मनी ने 10 मिलियन यूरो हरित क्षेत्र और समावेशी विकास के लिए आर्थिक मदद दी है। इस मदद से नेपाल अपनी बिजली जरूरतों की पूर्ति सौर ऊर्जा से पुरी कर सकता है।


हालाकि जर्मनी ने बांग्लादेश को जल्द जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए आर्थिक मदद देने का वादा किया है। इन सभी देशों को आर्थिक देना सभी विकसित देशों का कर्तव्य और जिम्मेदारी है।

जर्मन राजदूत का महत्त्वपूर्ण बयान

जर्मन राजदूत Walter j linder ने भारत से संबंधित एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने अपने बयान में कहा है कि धरती पर हर पांचवां व्यक्ति भारतीय है और भारतियों के बिना दुनिया किसी भी बड़ी समस्या से लड़ नहीं सकती है और जलवायु परिवर्तन दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती है।

जर्मनी की आर्थिक मदद के पीछे का उद्देश्य

जर्मनी ने भारत को जलवायु परिवर्तन लड़ने के लिए 10,000 करोड़ की आर्थिक सहायता दी है। जिसमें जर्मनी का भी स्वार्थ छिपा हुआ है। जर्मनी अपनी कंपनियों को ABO Wind, EnviTec Biogas, Solytic और Sunfire कंपनियों की मदद से कुछ सोलर प्लांट मुफ्त में स्थापित करेगी। जिससे जर्मनी की कंपनियों को फायदा  होगा।  क्योंकि भारत अगले कुछ सालों में सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए 100 बिलियन डॉलर से अधिक खर्च करेगा। जब  भारत सरकार बड़े टेंडर प्रक्रिया सोलर प्लांट स्थापित करने के लिए निकलेगी। तो यह कह सकती हैं कि मैं भारत में बहुत दिनों से काम कर रही हूं। भारत सरकार भी इनको बड़े प्रॉजेक्ट दे सकती है।

दुनिया में टॉप 5 जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार देश

दुनिया में जलवायु परिवर्तन के लिए 5 सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। जो पूरी दुनिया का लगभग आधा कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं। वर्तमान समय में दुनिया में कॉर्बन उत्सर्जन में चीन , अमेरिका , भारत, रूस और जर्मनी टॉप पांच देश हैं।

दुनिया के करीब 10 देशों ने 1310 से 2007 के बीच बडी मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन किया है।

1 अमेरिका (339,174 मीट्रिक टन या 28.8%)

2. चीन  (105,915 मीट्रिक टन या 9.0%)

3. रूस (94,679 मीट्रिक टन या 8.0%)

4. जर्मनी  (81,194.5 मीट्रिक टन या 6.9%)

5. इंग्लैंड ( 68,763 मीट्रिक टन या 5.8%)

6. जापान (105,915 मीट्रिक टन या 9.0%)

7. फ्रांस  (32.667 मीट्रिक टन या 2.77%)

8. भारत (28,824 मीट्रिक टन या 2.44%)

9. कनाडा (25,716 मीट्रिक टन या 2.2%)

10. यूक्रेन (25431 मीट्रिक टन या 2%)

भारत ने 1310 से 2007 के बीच मात्र 28,824 मीट्रिक टन कार्बन का उत्सर्जन किया है। जबकि विकसित देश अमेरिका ने दुनिया में सबसे ज्यादा 339,174 मीट्रिक टन कार्बन का उत्सर्जन किया है। जिससे अब इन देशों की जिम्मेदारी है कि गरीब और विकासशील देशों की आर्थिक मदद करना। क्योकि विकसित देशों के पिछले कुकर्मों का प्रभाव विकासशील और गरीब देशों पर पड़ रहा है। 


Post a Comment

Previous Post Next Post