अगर चीन और अमेरिका का युद्ध होता, तो इस युद्ध में चीन के विस्तारवाद से पीड़ित देश अमेरिका की तरफ होगे

चीन ने पिछले दशक में अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ी तेजी से बढ़ाया है। जिससे कुछ रक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञ कह रहे हैं कि चीन सैन्य शक्ति के मामले में अमेरिका के समकक्ष खड़ा हो गया है। लेकिन यह कहना अतिशोक्ति होगा। तो चलो आज चीन की सैन्य शक्ति के बारे में समझ लेते हैं।

चीन की सैन्य शक्ति का उल्लेख

चीन में 14 मार्च 2013 में शी जिनपिंग राष्ट्रपति चुने गए थे। जिसके बाद उनके शासन में चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने अपनी सैन्य शक्ति में बहुत ज्यादा वृद्धि की है। जिस चीन का 2013 में सैन्य बजट 116 बिलियन अरब डॉलर था जो 2021 में 6.8 % की वृद्धि के 209 अमेरिकी यूएस डॉलर हो चुका है। जिससे चीन ने अपनी स्थल सेना, नौसेना, और वायु सेना को मजबूत किया है। चीन की कुल सैन्य ताकत है।

विमान वाहक पोत

    2 एयरक्राफ्ट कैरियर
      नाम- लिओनिंग(रशियन मूल का) और        शेडोंग (स्वदेशी)

कुल लड़ाकू जहाज

      350 वारशिप

कुल लड़ाकू विमान

       1571 फाइटर प्लेन

कुल लड़ाकू हेलीकॉप्टर

        902 फाइटर हेलीकॉप्टर

पनडुब्बियों

     कुल 74 (परमाणु पनडुब्बी 4 व                बैलेस्टिक मिसाइल पनडुब्बी 6)

कुल सक्रिय सैनिक

       20 लाख सैनिक
जिस तरह चीन अपनी शक्ति में दिनों दिन बढ़ाता जा रहा है। उससे लग रहा है कि चीन अमेरिका को सैन्य हथियारों के मामले में पीछे छोड़ देगा। खुद अमेरिका के रक्षा विभाग पेंटागन ने एक रिर्पोट जारी की थी, जिसमें उसने बताया कि चीन अमेरिका को सैन्य मामले में 2029 तक पीछे छोड़ देना चाहता है और विश्व में सबसे बड़ी सैन्य शक्ति बन जाना चाहता है। चीन अपनी सैन्य शक्ति के दम पर अमेरिका को 2050 तक विश्व की महाशक्ति के पद से हटा देना चाहता है और खुद अमेरिका का स्थान प्राप्त करने की चाहता में हैं
लेकिन एक बात सोचने योग्य है कि चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी के सैन्य हथियार अमेरिका की तरह प्रभावशाली हैं। तो जिसका सीधा जबाव नहीं में हैं। क्योंकि हम इस बात से समझ सकते हैं कि अमेरिका के पास जितने विमान वाहक पोत (कुल 11) हैं। वह सब परमाणु ऊर्जा से चलने वाले विमान वाहक पोत हैं। जबकि चीन के निम्न गुणवत्ता के विमान वाहक पोत हैं। चीन के दुसरे सैन्य हथियार जैसे लड़ाकू विमान चेंगदू जे-20 अमेरिका के एफ 22 रेप्टर और एफ 35 की नकल हैं। जिसको चीन तथाकथित 5वी पीढ़ी का स्टेल्थ लडाकू विमान कहता है। अगर हम चीन और अमेरिका की पनडुब्बियों की तुलना करेंगे। तो चीन संख्या की दृष्टि से अमेरिका पर भारी पड़ रहा है। लेकिन चीन के पास कुल परमाणु पनडुब्बियां 6 हैं और अमेरिका की नेवी के पास मौजूद सभी 60 पनडुब्बियां परमाणु ऊर्जा से चलती हैं। जिनकी तकनीक चीन की नकल वाली तकनीक से कई हजार गुना श्रेष्ठ है।

चीन अमेरिका से कभी युद्ध में नही जीत सकता है। 

जिसकी पहली बडी वजह है कि चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने 1979 की वियतनाम युद्ध के बाद कोई जंग ही नहीं लड़ी है। जबकि अमेरिकी सेना ने इराक, सीरिया, लीबिया और अफ़ग़ानिस्तान में बड़ी जंग लड़ी हैं। जिनसे उनका युद्ध लड़ने का अनुभव चीन की सेना से बहुत अधिक है।
दूसरी बड़ी वजह यह है कि चीन की शी जिनपिंग सरकार ने अपने पड़ोस में दोस्तों से अधिक दुश्मन बना रखें हैं। जिनको जब मौका मिलेगा। वो चीन पर वर्षों का गुस्सा और नफ़रत उतार देगें। जिनमें जापान, वियतनाम, इंडोनेशिया, और आसियान देश शामिल हैं। चीन के प्रति अगर किसी देश के अंदर गुस्सा और नफ़रत है। तो वह भारत है। जिसको अगर मौका मिलता है। तो भारत चीन का इतिहास और भूगोल दोनों बदल कर रख देगा। क्योंकि चीन की  कम्यूनिस्ट पार्टी  ने चीन के पड़ोसी देशों की संप्रभुता और अखंडता का कभी आदर नहीं किया है। जिसका एक दिन चीन को बड़ा भुगतान करना ही होगा। 
हालाकि चीन का हर मौसमी दोस्त पाकिस्तान है। लेकिन वह डूबता जहाज है। जो दूसरों के सहारे चल रहा है। जिस दिन अमेरिका और दूसरी पश्चिमी देशों ने पाकिस्तान पर कार्यवायी की या तो पाकिस्तान सुधार जायेगा। अन्यथा पाकिस्तान टूटकर कई देशों में बंट जायेगा। चीन का सबसे शक्तिशाली देश रूस है। लेकिन वह भी चीन की बढ़ती शक्ति से चिंतित हैं। क्योंकि इतिहास गवाह है कि चीन किसी का सगा नहीं हुआ है। उसका खुद चीन के साथ हजारों किलोमीटर का बॉर्डर लगता है। अगर रूस ने भारत को नदरंदाज करते हुए, चीन का साथ दिया। तो इसका मतलब होगा कि रूस भारत जैसे आर्थिक ताकत को अमेरिका और दुसरे पश्चिमी देशों को थाली में परोस कर दे रहा है। जबकि रूस को यह अच्छे से पता है कि भारत कभी भी रूस के खिलाफ़ अमेरिका और दूसरी पश्चिमी ताकतों का साथ नहीं देगा। 

तीसरी सबसे बड़ी वजह यह है कि जैसे जैसे चीन सैन्य शक्ति में वृद्धि कर रहा है तो इसके जबाव में हिंद प्रशांत क्षेत्र के देश जापान, आस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, ताईवान, वियतनाम और भारत भी बड़ी तेजी से अपनी सैन्य शक्ति में वृद्धि कर रहे हैं। जिसमें ऑस्ट्रेलिया ने अमेरिका और इंग्लैंड के साथ 80 बिलियन डॉलर का परमाणु पनडुब्बियों का बड़ा समझौता किया है। जिससे ऑस्ट्रेलिया को कुल 8 परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बिया  प्राप्त होगी। दूसरी तरफ भारत ने रूस से एस- 400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदा और अपनी ब्रह्मोस मिसाइल, अग्नि मिसाइल की मारक क्षमता में वृद्धि कर रहा है। इसी के साथ भारत तिब्बत की अपनी सीमा पर आधारभूत संरचना का बड़ी तेजी से बढ़ा रहा है। जापान ने अमेरिका से एफ 35 लड़ाकू विमान का 23 अरब डॉलर का बड़ा सौदा किया है। ताकि जापान दक्षिण चीन सागर और जापान सागर में चीन की दादागिरी का सामना कर सकें। अगर चीन कोई भी हिंद प्रशांत क्षेत्र में कार्यबायीं करता है तो यह सब देश अमेरिका के साथ हो जायेगें। फिर इसके बाद चीन इनकी संयुक्त शक्ती का सामना कभी नहीं कर सकता है। 

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