तालिबान ने अपना गुस्सा अमेरिका पर उतारते हुए अफगानिस्तान में यूएस मुद्रा को बैन किया।

अफगानिस्तान की वर्तमान में आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। तब भी तालीबान ने विदेशी मुद्रा को लेकर बड़ा फैसला किया है। तालिबान ने इस मंगलवार को अफ़ग़ानिस्तान में चलने वाली सभी विदेशी मुद्राओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया है।


विश्व की विख्यात समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, अफ़गानिस्तान में अमेरिका 20 वर्षों तक रहा था। इसलिए पूरे अफ़गानिस्तान में अमेरिकी डॉलर का चलन बहुत ज्यादा था। जबकि अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों की सरहदी इलाकों में पाकिस्तानी, ईरानी मुद्रा में व्यापार होता है। जिस वजह से पड़ोसी देशों की मुद्राओं की कमी थी। जिससे बड़े पैमाने पर लोगों को भुखमरी का शिकार होना पड़ता है।

तालिबान ने इस मामले में प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी मुद्रा के चलन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है और यदि कोई व्यक्ति इस आदेश का उल्लघंन करता पाया गया। तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जायेगी। 

तालिबान के आधिकारिक प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद विदेशी मुद्रा बैन पर बोले कि अफगानिस्तान में सभी लेन देन सिर्फ और सिर्फ अफगानी मुद्रा में ही होने चाहिए। इस आदेश का उल्लघंन करने वाले लोगों को सख्त सजा दी जायेगी ।

अफगानिस्तान पर तालीबानी कब्जे के बाद अमेरिका के यूएस फेडरल रिजर्व बैंक और यूरोपीय देशों  के बैंको ने अफगानिस्तानी "दा अफगानिस्तान बैंक"  के अरबों डॉलर को रोक रखा है। जिसके लिए तालिबान ने अमेरिका से कहा था कि अमेरिका अफगानिस्तान के अरबों डॉलर पर लगें प्रतिबंध को बिना शर्त के हटाना चाहिए। तालिबान इन दिनों बहुत ज्यादा परेशान है। क्योंकि उनके पास अफगानिस्तान को सुचारू ढंग से चलाने के लिए पैसा ही नहीं है। जिस कारण से अफगानिस्तानी इकोनॉमी कभी भी ढह सकती है। 

अफगानी इकोनॉमी के बारे में यूएन चीफ सेक्रेटरी एंटोनियो गुटेरस ने दुनिया को बताया था कि अफगानिस्तान की ढहती इकॉनोमी को पुनर्जीवित करने के लिए सभी को मिलकर काम करने की जरूरत है। उन्होंने आगे कहा था कि हम अंतरराष्ट्रीय कानूनो का उल्लंघन किए बिना या अपने सिद्धांतों के साथ समझौता किए बिना ही अफ़गान इकोनॉमी को ढहने से बचा सकतें हैं। 

अगर अफ़गान इकोनॉमी को पुनर्जीवित नहीं किया गया। तो पूरा अफगानिस्तान एक देश के तौर पर बर्बाद हो जायेगा। इस तरह की परिस्थिति में अफगानितान के कई टुकड़े हो सकते हैं। क्यों कि पूरे देश कन्ट्रोल रखने के लिए कोई जिम्मेदार अथॉरिटी ही नहीं होगी। 

इस समय तालिबान अफगानिस्तान में शासन कर रहा है। लेकिन इन लोगों को सरकार चलाना ही नहीं आता है। इनके राज में पूरे अफगानिस्तान में चोरी व डकैती की घटनाओं में बहुत ज्यादा वृद्धि हुई है। इसी के साथ तालिबान के पास धन की कमी है। जिस कारण से तालिबान की अफगानिस्तान पर से पकड़ ढीली होती जा रही है। जिसका फायदा ISIS-K उठा रहा है। वह तालीबान से नाराज लोगों को भड़का रहा है और अपने संगठन में भर्ती करवा रहा है। जिससे ISISK अफगानिस्तान में दिनों दिनों ताकतवर होता जा रहा और तालिबान हर गुजरें समय के साथ कमजोर पड़ता जा रहा है।

अफगानी लोगों के इसलामिक स्टेट खुरासान (ISIS K) मे शामिल होने का दुसरा बड़ा कारण 'भुखमरी व गरीबी ' है। क्योंकि  जहां गरीबी और भुखमरी होती है। वहां ISISK जैसे आतंकी संगठनों के मज़बूत होने के ज्यादा अवसर होते हैं।

अफगानिस्तान में  तालिबान के आने से पहले लोग लोकतान्त्रिक सरकार के नेतत्व में खुश और आर्थिक तौर पर मज़बूत थे। जिसकी सबसे बडी वजह पश्चिमी देशों की ओर अफगानिस्तान को मिलने वाली आर्थिक मदद थी। लेकिन तालिबान के अफगानिस्तान में आ जानें के कारण सभी अमीर पश्चिमी देशों ने अफगानिस्तान की आर्थिक मदद को रोक दिया है। जिसका सबसे बड़ा भुगतान आम अफगानी कर रहा है। आज आम जनता के पास दो वक्त का पेट भरने के लिए पैसा नहीं है। सभी प्रकार के खाद्यान्य  की कीमतें आसमान छू रही है। पेट भरने के लिए लोग अपने घरों का सामान भी रद्दी के भाव बेच रहें हैं और कुछ अफगानी पाकिस्तान में भाग गए।

अगर अफगानिस्तान में एक मानवीय संवेदनाओं से देखा जाए। तो वहां की और वहां के लोगों की हालत गंभीर बनी है। लोग जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे थे। अफगानिस्तान में मानवीय संकट आने वाली ठंडो में खड़ा होने वाला है। क्यों कि लोगों के पास ठंडो से बचाव करने के लिए कोर भी संसाधन नही बचे हैं। जिसके लिए यूनाइटेड नेशंस भी अफगानिस्तान के मानवीय संकट पर समय समय पर दुनिया को सचेत करता रहता है।

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