इस्लामिक सहयोग संगठन दुनिया भर के मुस्लिमों का झंडावरदार संगठन, लेकिन आतंकवाद और कट्टरता पर पूरी तरह विफल रहा।

पाकिस्तान में 19 दिसम्बर से ओआईसी का 17 वा सत्र चल रहा है, जिसमें सभी इस्लामिक देशों के विदेश मंत्रियों को शामिल होना है। लेकिन हम ओआईसी संगठन के बारे में विस्तार से जानेंगे।


हाईलाइट

स्थापना 

25 सितंबर 1969

मुख्यालय

जेद्दा, सऊदी अरब

कुल देश 

57

अफ्रीका से सदस्य देश

27

एशिया से सदस्य देश

27 (एक सीरिया निलंबित)

यूरोप से सदस्य देश

1 अल्बानिया

दक्षिण अमेरिका से सद्स्य देश

2 गुआना और सूरीनाम

पहला शिखर सम्मेलन

22 से 25 सितम्बर 1969

कुल जनसंख्या

1.81 अरब

ओआईसी (OIC)

ओआईसी का पूर्ण नाम इस्लामिक सहयोग संगठन ( Organisation of Islamic Cooperation) है, जो एक इस्लामिक संगठन है। जिसकी स्थापना 25 सितंबर  1969 के रबात (मोरक्को) के शिखर सम्मेलन के बाद सऊदी अरब के जेद्दा शहर (1971) में हुईं थीं। जिसकी स्थापना के शुरूआती सदस्य 24 मुस्लिम राष्ट्र थे। इसका पहला शिखर 22 से 25 सितम्बर सन 1969 में रबात मोरक्को में हुआ था। लेकिन 28 जून 2011 की अस्ताना विदेश मंत्रियों की बैठक से पहले OIC का नाम आर्गेनाइजेशन ऑफ द इस्लामिक कांफ्रेंस था।

OIC का आदर्श वाक्य 

    "मुसलमानों के हितों की रक्षा करना और उनकी प्रगति और भलाई सुनिश्चित करना "

इस्लामिक सहयोग संगठन का चार्टर व उद्देश्य

ओआईसी ने अपना चार्टर सन् 1972 में अपनाया था, जिसके आधार पर सभी इस्लामिक सद्स्य देशों के मध्य आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर सहयोग की आशा की गई थी। इसके अलावा फिलिस्तीन संघर्ष को सहयोग देना और उसकी लड़ाई को सभी इस्लामिक देश लड़ेगे। दुनिया भर के मुसलमानों की स्वतंत्रता और आधिकारों के लिए आवाज उठाना आदि। हालाकि यह संगठन आतंकवाद के मुददे पर चुप रहता है। लेकिन जब भारत के कश्मीर की बात हों तो यह संगठन हमेशा भारत की आलोचना ही करता है। जबकि पाकिस्तान के द्वारा फैलाए जा रहे आंतकवाद पर कुछ नहीं बोलता है, दुनिया में बढ़ रही इस्लामिक कट्टरता पर यह संगठन हमेशा चुप रहता है। 

ओआईसी की संरचना

इस्लामिक सहयोग संगठन दूसरे संगठनों की तरह ज्यादा संगठित संगठन नहीं है, क्योंकि इसके सद्स्य देशों के राष्ट्र प्रमुखों की बैठक 3 वर्षों के बड़े अंतराल पर होती है। जबकि जी 20, जी 7 और नाटो जैसे संगठनों के राष्ट्र प्रमुखों की बैठक हर वर्ष बुलाई जाती है। 

इस संगठन के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जिसमें सभी इस्लामिक सद्स्य देशों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं, पहली बार इस्लामिक सहयोग संगठन के विदेश मंत्रियों की बैठक 1970 में बुलाई गई थी, जिसमें 24 सद्स्य देशों के विदेश मंत्रियों ने हिस्सा लिया था। इस संगठन का एक महासचिव होता है। जिसका काम राष्ट्र प्रमुखों के लिए एक रिपोर्ट तैयार करना और दुसरे कार्यों की रूप रेखा तैयार करनी होती है।

इस संगठन का एक अन्य महत्वपूर्ण अंग संसदीय संघ (PUOICM) भी है। जिसकी स्थापना ईरान में 1999 में हुईं थीं और इसका मुख्यालय भी ईरान की राजधानी तेहरान में स्थित है।

ओआईसी के सद्स्य देश

ओआईसी एक इस्लामिक संगठन है, जिसमें करीब 57 सदस्य के तौर पर शामिल हैं। इस संगठन के शाक्तिशाली देश सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, तुर्की और ईरान हैं। जबकि पाकिस्तान मात्र एक परमाणु शक्ति संपन्न इस्लामिक देश है। लेकिन पाकिस्तान की आर्थिक हालत गंभीर हो चुकीं है, जो अब चीन का उपनेविश बनने के कगार पर पहुंच चुका है। 

इस्लामिक सहयोग संगठन के 57 सद्स्य देशों में से एक संयुक्त राष्ट्र संघ का सद्स्य नहीं है। इसके अलावा 7 गैर इस्लामिक बहुमत वाले देश सद्स्य के तौर पर शामिल हैं। जबकि कुछ इस्लामिक आबादी वाले देश जैसे रूस और थाईलैंड ऑब्जर्वर के रूप में शामिल हैं। 

हालाकि भारत इसका सदस्य नहीं है। लेकिन सुषमा स्वराज पहली बार भारत की ओर से ओआईसी की एक विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल हुईं थीं।

अमेरिका ने 27 जून 2007 को इस्लामिक सहयोग संगठन में अपना एक दूत भेजा था। तब अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश थे।

ओआईसी के प्रमुख बयान

1. 18 अप्रैल 2020 को, OIC ने एक बयान जारी किया था, जिसमें ओआईसी ने मोदी सरकार से भारत में बढ़ते इस्लामोफोबिया को रोकने के लिए कहा था। इसके अलावा भारत में मुसलमानों पर तथाकथित हमलों को लेकर आलोचना की थी।

2. सितंबर 2005 डेनिश समाचार पत्र में मुहम्मद के कार्टून के कार्टूनों को छापा था। जिसको लेकर ओआईसी ने दिसम्बर 2005 में इस्लामिक सहयोग संगठन के तीसरे असाधारण सत्र में कठोर आलोचना की थी।

3. सितम्बर 2019, बेंजामिन नेतन्याहू की जॉर्डन घाटी और वेस्ट बैंक के पूर्वी हिस्से को जोड़ने की योजना की कड़ी निन्दा की ।

4.दिसंबर 2017, अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जेरूसलम को इज़राइल की राजधानी के रूप में मान्यता दे दी थी, जिसके बाद इस्लामिक सहयोग संगठन ने "अल कुद्स के लिए स्वतंत्रता पर इस्तांबुल घोषणा" का ऐलान किया।

5. OIC इजरायल-फिलिस्तीनी संघर्ष में शामिल रहा है, इस विषय पर OIC इजरायल-फिलिस्तीनी नाम के दो देशों की संस्तुति करता है और फिलिस्तीनी क्षेत्रों पर इजरायली कब्जों का विरोध करता है। हालाकि इससे इजरायल पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है।

निष्कर्ष;

अगर देखा जाए तो इस्लामिक सहयोग संगठन गैर इस्लामिक देशों को अपनी आलोचना से शिकार बनाता है, जिसमें भारत भी शामिल है। ओआईसी इस्लाम के नाम कश्मीर मामले पर पाकिस्तान का पक्ष लेता रहा है और भारत की मोदी सरकार को राजनीतिक रूप से लक्षित करता रहा है। दूसरी तरफ यह संगठन इस्लामिक आतंकवाद के मुददे पर पूरी तरह से विफल रहा है। क्यों कि इसकी स्थापना के आज 52 वर्ष  पूर्ण हो चुके हैं। तब भी इसने आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देशों को निशाना नहीं बनाया है। जबकि यह ऐसे देशों का समर्थन करता रहा है। हाल के वर्षों में आतंकवादियों के द्वारा घृणित कार्य किए हैं। तब भी यह संगठन एक दम चुप रहा था। जबकि भारत और इजराइल के मामले पर मुखर होकर बोलता है।  

यह पूरी दुनिया में मुसलमानों के अधिकारों के लिए लड़ता है लेकिन यहीं संगठन पाकिस्तान में गैर मुस्लिमों पर हो रहे अत्यचारों पर चुप रहता है। अफ़ग़निस्तान में तालिबान के आतंकवाद का विरोध कतई नहीं करता। जबकि भारत में कश्मीरी मुस्लिमों के लिए बड़ी बड़ी बैठके बुलाता और भारत सरकार पर झूठे आरोप लगाता। लेकिन यहीं संगठन कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्यचारों पर कुछ नहीं बोलता है। क्योंकि कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार इस्लामिक आतंकवादियों ने लिए थे। जहां हजारों कश्मीरी पंडितों की मां और बहनों के साथ सामूहिक बलात्कार किए गए थे।  लाखों की संख्या में कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से विस्थापित होना पड़ा था। 

इसलिए इस्लामिक सहयोग संगठन मात्र एक हीन भावना से प्रेरित संगठन है, जिसका अपना एक राजनीतिक एजेंडा है। जो बढ़ती कट्टरता और आंतकवाद पर मौन व्रत धारण करें रहता है।

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