तालीबान ने पाकिस्तान के एक बड़े हिस्से पर दावा किया, डूरंड रेखा को अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर मानने से इन्कार किया

पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच बीच एक सीमा रेखा है, जिसको दुनिया डूरंड रेखा के नाम से जानती है। यह दुनिया की विवादित सीमा रेखा में से एक है। अभी हाल में ही पाकिस्तान द्वारा डूरंड रेखा पर बाड़ का निर्माण शुरू किया था। जिसका तालीबान ने विरोध किया और साथ में ही तारों के बाड़ों को भी उखाड़ फेंका। 

डूरंड रेखा का इतिहास

दरअसल अफ़ग़ानिस्तान दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के साथ 2,640 (1660 मील) किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है, जो ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों, घने जंगलों वाली घाटियों और संकरे, पथरीले रास्तों से होकर गुजरता है। 

डूरंड रेखा के जनक एक अंग्रेज अधिकारी मोर्टिमर डूरंड थे, जिन्होंने दूसरे अफगान आंग्ल युद्ध के दौरान 12 नवंबर 1893 को डूरंड रेखा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

इस समझौते पर अफ़ग़ानिस्तान की ओर से 1897 में अफगान अमीर अब्दुर रहमान खान  ने एक  हस्ताक्षर किए थे। यहीं कारण है कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान की वर्तमान सीमा रेखा को मोर्टिमर डूरंड के नाम से जाना जाता है, जो उस समय के औपनिवेशिक ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव हुआ करते थे।

डूरंड रेखा के विवाद का कारण

अफगानिस्तान की भूतपूर्व सरकार भी डूरंड रेखा को अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर के रूप में स्वीकार नहीं करती थीं और वर्तमान तालिबान सरकार ने डूरंड रेखा को मानने से इंकार कर दिया है। हालाकि दुनिया डूरंड रेखा को अफगानिस्तान और पाकिस्तान का अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर मानती है। लेकिन अफगानिस्तान की सरकार और वहां की जनता डूरंड रेखा को स्वीकार नहीं करती है। 

जिसका सबसे बड़ा कारण पश्तून जाति के लोग हैं। क्योंकि  डूरंड रेखा पश्तून जाति के लोगों को दो हिस्सों में बांटती हैं। जबकि पश्तून जाति के लोग अपना लगाव अफगानिस्तान के प्रति दर्शाते हैं। उनका मानना है कि ब्रिटिश भारत के दौरान ताकत के दम पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान का बॉर्डर बना है। 

भारत की आजादी (1947 में) के बाद पाकिस्तान को डूरंड रेखा का विवाद विरासत में मिला। जो समय के साथ गम्भीर रूप धारण करता जा रहा है। पिछली अफगान सरकार ने पाकिस्तान के बाड़े लगाने की परियोजना का कड़ा विरोध किया था और सीमा विवाद को लेकर पाकिस्तानी और अफगान बलों के बीच कई हिंसक घटनाएं हुई थीं, जिसके परिणामस्वरूप कई लोग मारे भी गए थे। 

अफगानिस्तान का पाकिस्तान को पश्तूनिस्तान देश बनाने का प्रस्ताव

अफगानिस्तान ने एक बार पाकिस्तान को पश्तूनिस्तान नाम से एक देश बनाने का प्रस्ताव भी दिया था। जिसके लिए अफगानिस्तान सरकार ने कहा था कि थोड़ा हिस्सा अफगानिस्तान देगा और पश्तून आबादी वाले हिस्से को पाकिस्तान देगा। लेकिन पाकिस्तान मानने को तैयार नहीं है। क्योंकि पाकिस्तान बांग्लादेश के रूप में एक बड़ा भूभाग गवां बैठा है। यदि पश्तूनिस्तान बनता है तो पाकिस्तान अपने क्षेत्रफल का 40% हिस्सा खो बैठेगा। क्योंकि पाकिस्तान में बड़े हिस्से पर पश्तून आबादी निवास करती है। 

यदि डूरंड रेखा की समस्या नहीं सुलझती है तो यह शीघ्र ही पाकिस्तान के लिए विकट समस्या बनना तय है। क्योंकि अफ़गान तालिबान और पाक तालीबान दोनों मिलकर पाकिस्तान को बर्बाद कर देगें।

तालीबान का डूरंड रेखा पर अधिकारिक स्थिति

तालीबान भी पूर्व अफगानिस्तान सरकार की भांति डूरंड रेखा को नहीं मानता है।  इसी विषय पर तालीबान सरकार के रक्षा मंत्रालय ने अपना बयान दिया। अफगान रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता इनायतुल्ला ख्वारज़मी ने कहा था कि तालिबान बलों ने पाकिस्तानी सेना को नंगरहार के पूर्वी प्रांत के साथ एक "अवैध" सीमा बाड़ लगाने से रोक दिया है। इसी के साथ तालीबान के सैन्य बलों ने तार के बाड़ों को उखाड़ फेंका है।

अफगानिस्तान की डूरंड रेखा पर अधिकारिक स्थिति

पाकिस्तान ने सोचा था कि तालीबान को अफगानिस्तान की सत्ता में ले आए और उससे डूरंड रेखा पर सहमति दिलवा ले। लेकिन पाकिस्तान की सारी योजनाओं पर पानी फिर गया। क्योंकि तालीबान भी भूतपूर्व सरकारों की भांति डूरंड रेखा को नहीं मानता है। जिससे साफ होता है कि अफगानिस्तान की नज़र में डूरंड रेखा एक "विवादित सीमा सीमांकन" है। यहीं कारण है कि पाकिस्तान द्वारा शुरू की गई एकतरफा सीमा बाड़ लगाने के काम का अफगान सरकार से मजबूत तरीके से विरोध किया गया है।

2017 में , पूर्व अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने कहा था कि अफगानिस्तान कभी भी दोनों देशों के बीच डूरंड रेखा को सीमा रेखा के रूप में मान्यता नहीं देगा।

पाकिस्तान की सबसे बड़ी भूल तालीबान

पाकिस्तान के लिए तालिबान सबसे बड़ी भूल साबित होगा।  क्यों कि दुनिया में एक कहावत प्रचलित है कि जब अपने घर के पिछाबाड़े में सांप पालोगें तो वह सिर्फ़ पड़ोसियों को नही काटेगा। बल्कि पालने वाले को भी काटेगा। यह कहावत पाकिस्तान के लिए सही बैठ रहीं है। पाकिस्तान की इस तरह की दुर्दशा पर मजा अमेरिका और वहां की मीडिया ले रहीं है।

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