श्री लंका ने चीनी कम्पनी के प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया, चीन जिसके माध्यम से भारत के रामेश्वरम के निकट आ जाना चाहता था।

भारत ने चीन को श्री लंका के एक ओर महत्वपूर्ण प्रॉजेक्ट से बाहर करवा दिया। अगर ये प्रॉजेक्ट चीन के हाथों में पहुंच गया होता। तो इससे सीधे तौर पर भारत की सुरक्षा को खतरा था। 




दरअसल चीन की एक फर्म सिनो सोअर हाइब्रिड टेक्नोलॉजी (Sino Soar Hybrid Technology) ने जनवरी महीने में  जाफना के तट पर डेल्फ़्ट, नागादीपा और अनलथिवु (Delfa, Nagadeepa, and Analthivu) द्वीप समूह में एक हाइब्रिड नवीकरणीय ऊर्जा प्रणाली स्थापित करने के लिए श्री लंका सरकार से अनुबंध हासिल किया था। लेकिन यह परियोजना भारत के राज्य तमिलनाडु के तट रामेश्वरम से बेहद करीब था। इसलिए भारत सरकार ने श्री लंका की सरकार के सामने डिप्लोमेटिक माध्यम से फरवरी 2021 को विरोध किया था। 



आज श्रीलंकाई साप्ताहिक संडे टाइम्स ने बताया कि  चाइनीज प्राइवेट कंपनी सिनोसार-एटेकविन को $12 मिलियन की परियोजना प्रदान की गई थी, जिसको अब रद्द कर दिया गया है। अब इसको श्री लंका सरकार की सहायता से बिजली सुधार परियोजना के हिस्से के रूप में राज्य की स्वामित्व वाली 'सीलोन बिजली बोर्ड' एक  के साथ एक संयुक्त उद्यम के रूप में पूर्ण की जायेगी।


इस परियोजना को पूर्ण करने के लिए भारत सरकार ने श्री लंका सरकार को 12 मिलियन डॉलर लगभग मुफ्त में देने का ऑफर दिया। जिस पर श्री लंका की सरकार राजी हो गई। लेकिन चीन की सरकार ने यहां पर दावा किया था कि जो चीनी फर्म इस प्रोजेक्ट को बनाने जा रही है।  वह एक प्राइवेट कंपनी है। जबकि सच्चाई यह है कि चीन में ज्यादातर प्राइवेट कंपनियों में चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी के नेताओं का पैसा लगा होता है। 


चीन का झूठ तब पकड़ा गया जब श्री लंका में मौजूद चीनी दूतावास ने इस प्रोजेक्ट के रद्द करने की घोषणा की। जिसमें चीनी दूतावास ने भारत का नाम लिए बिना कहा कि श्रीलंका के 3 उत्तरी द्वीपों में हाइब्रिड ऊर्जा प्रणाली का निर्माण करने के लिए निलंबित किया जा रहा है, इस प्रोजेक्ट से एक तीसरे देश को सुरक्षा चिंता है। इसके बजाय बीजिंग ने मालदीव में 12 द्वीपों पर सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने के लिए 29 नवंबर को माले के साथ एक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं।

चीन की कम्पनी को यह प्रॉजेक्ट प्राप्त हो जानें के बाद डर था कि चीन ने जिस तरह से संयुक्त अरब अमीरात में एक व्यापारिक बंदरगाह विकसित करने के लिए प्रोजेक्ट लिया था। जबकि चीन  वहां चोरी छिपे अपना एक सैन्य अड्डा बना रहा था। जिसकी पोल अमेरिका ने अपने सैटेलाइट के द्वारा ली गई तस्वीरों द्वारा खोल दी। जिसके बाद संयुक्त अरब अमीरात ने बंदरगाह के प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया और बंदरगाह पर भी पुनः कब्ज़ा कर लिया।


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