पाकिस्तान के परमाणु हथियार भारत के खिलाफ अमेरिकी साजिश थी, यूं कहूं तो गिफ्ट थे, जिसमें साथ कम्यूनिस्ट चीन ने भी दिया था

परमाणु हथियार न केवल एक देश को प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करते हैं बल्कि इनसे वह पूरी दुनिया के आने वाले भविष्य का निर्णय भी कर सकता है।  एक परमाणु शक्ति संपन्न देश को जिम्मेदार होना चाहिए और अगर ऐसा नहीं होता है तो दुनिया हमेशा अपने भविष्य की अनिश्चितताओं में घिरी रहेंगी। 

हालाकि दुनिया की सर्वोच्च शक्तियों ने परमाणु हथियारों को गलत हाथों में जानें से रोकने के लिए कुछ उपाय किए हैं। जैसेकि एनपीटी जैसी संधियों की मदद से विश्व शक्तियाँ यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती हैं कि परमाणु हथियार शत्रुतापूर्ण व गैर जिम्मेदार देशों की पहुँच से बाहर हों।

सर्वोच्च शक्तियों के होते हुए भी उत्तर कोरिया और पाकिस्तान वर्तमान में परमाणु शक्ति संपन्न देश बन गए हैं, पाकिस्तान ने  28 मई 1998 को बलूचिस्तान प्रांत में 5 भूमिगत परमाणु परीक्षणों को अंजाम दिया था, जिनके बाद पाकिस्तान ने खुद को एक परमाणु हथियार सक्षम राष्ट्र घोषित किया था। पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम भारत के परमाणु परीक्षण का एक जवाब था, भारत ने अपने परमाणु परीक्षण 11 से 13 मई 1998 के दौरान पोखरण में किया था।

लेकिन भारत एक जिम्मेदार देश है, जो हर अंतरराष्ट्रीय नियम और कानूनों को मानता है। जबकि दुनिया के लिए उत्तर कोरिया की तानाशाही एक चिंता का विषय है और पाकिस्तान के आतंकवादियों के साथ संबंध एक गम्भीर खतरा पैदा हो गया है। क्यों कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और वहां की सेना खुले तौर पर आतंकीयो का साथ दे रहीं हैं। जबसे अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान को छोड़ा है तब से पाकिस्तान के परमाणु हथियार गलत शक्तियों के हाथों में जानें का खतरा बढ़ गया है। 

पाकिस्तान के परमाणु सम्पन्न देश बनने की घटना

एक्यू खान  और भारत, भोपाल

पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के जनक अब्दुल कादिर खान या A.Q खान का जन्म 1 अप्रैल 1936 को भोपाल, भारत में हुआ था, लेकिन भारत के विभाजन के बाद 1952 में पश्चिमी पाकिस्तान चले गए थे। तब अंग्रेजो ने भारत के दो टुकड़े किए थे, जिससे एक पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान में बांग्लादेश) का जन्म हुआ था। एक्यू खान की कोरोना से ठीक होने के बाद 10 अक्टूबर 2021 को मृत्यु हो गई।

A.Q खान ने कराची विश्वविद्यालय से 1960 में धातु विज्ञान से स्नातक किया, जिसके बाद उन्होंने पाकिस्तान और विदेशी सरकारों की छात्रवृत्ति की योजनाओं की सहायता से विदेश में पढ़ने चले गए। इन्होंने नीदरलैंड में सन् 1967 में धातु विज्ञान में परास्नातक की डिग्री हासिल की और सन् 1972 में यूरोप के ही एक संस्थान भौतिक गतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला (Physcial Dynamics Reasearch Laboratory) में ही URENCO के एक सहायक के रूप में काम करना शुरू किया था। 

जहां एक्यू खान ने यूरेनियम संवर्धन और न्यूक्लियर फ्यूल के बारे में जानकारी प्राप्त की। लेकिन एक्यू खान ने URENCO संस्थान की सुरक्षा कमजोरियों का फायदा उठाया और अल्ट्रासेंट्रीफ्यूज तकनीक से संबंधित ढेर सारी जानकारी प्राप्त की। खान को जर्मनी के यूरेनियम संवर्धन के दस्तावेजों को डच भाषा में अनुवाद करने का टेंडर मिला, जहां से इन्होंने परमाणु हथियार बनाने के लिए यूरेनियम संवर्धन की तकनीक पूरी तरह से हासिल कर ली थी।

पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम भारत के परमाणु कार्यक्रम से संबंधित

यह वह समय था जब भारत की सहायता से दुनिया में एक नए देश बांग्लादेश का जन्म हुआ था और भारत ने अपना परमाणु परीक्षण सफलतापूर्वक सम्पन्न किया था। इन सभी घटनाओं से प्रभावित होकर खान ने 17 सितंबर 1974 को पाकिस्तान के तात्कालिक पीएम जुल्फिकार अली भुट्टो को पाकिस्तान के लिए परमाणु हथियार बनाने प्रस्ताव दिया। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को प्लूटोनियम से हटाकर यूरेनियम पर आधारित किया और एक्यू खान ने 1975 तक अपनी यूरोपियन कंपनी से यूरेनियम संवर्धन दस्तावेज चुराए थे। 

इसके बाद यह नीदरलैंड से पाकिस्तान 15 दिसम्बर 1975 को आये थे और अपने साथ डिवाइस के लिए आवश्यक पुर्जे प्राप्त करने के लिए यूरोपीय आपूर्तिकर्ताओं की एक सूची भी अपने साथ लाए थे। पाकिस्तान में इन्होंने मुनीर अहमद खान के साथ पाकिस्तान एटॉमिक रिसर्च कमीशन में काम किया। 

लेकिन जल्द ही इनकी मुनीर अहमद के साथ अनबन हो गई और खान ने बाद में enginnering Research Laboratory की स्थापना की । यह लैब कहुटा में स्थित है, जिसका 1981 में नाम बदल कर खान रिसर्च लैबोरेटरी कर दिया गया। पाकिस्तान एक्यू खान की की चोरी और मक्कारी की सहायता से 28 मई 1998 को एक परमाणु शक्ति संपन्न देश बन गया।

अमेरिका की देन पाकिस्तान को परमाणु हथियार

नीदरलैंड के पीएम रूड लब्बर्स और डच आधिकारियों को एक्यू खान पर 1975 में शक पैदा हो गया था कि एक्यू खान यूरेनियम संवर्धन और परमाणु हथियार बनाने की तकनीक को चोरी छिपे पाकिस्तान को भेज रहा है। डच आधिकारियों ने 1975 और 1986 में खान को गिरफ्तार करने का प्रयास किया था लेकिन डच पुलिस को दोनों बार यूएस और सीआईए द्वारा एक्यू खान को पकड़ने से रोक दिया गया। इसके अलावा अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने  हर बार एक ही संदेश डच आधिकारियों को दिया कि सभी जानकारी एक्यू खान को दे दो, लेकिन उन्हें गिरफ्तार मत करना।

हालाकि एक्यू खान के नीदरलैंड को छोड़ देने के बाद भी कोर्ट केस किया गया और उनको 4 वर्ष की सजा सुनाई गई। लेकिन एम्स्टर्डम कोर्ट से एक्यू खान के केस से संबंधित फाइल ही खो गई और इस काम के लिए न्यायाधीशों ने CIA को जिम्मेदार ठहराया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह डच क्षेत्र में दूसरा सबसे बड़ा परिणामी अपराध था,  लेकिन इस मामले को CIA ने पूरा होने से पहले ही खत्म करवा दिया था।

अमेरिका  की पाकिस्तान को खुली छूट

यह उस दौर का समय था, जब भारत और रूस मित्र देश थे और पाकिस्तान अमेरिका का एक मित्र देश था। जबकि भारत की अमेरिका से हरगिज़ नहीं बनती थी। भारत द्वारा 1974 का परमाणु परीक्षण और 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भारत और सोवियत की खुली दोस्ती अमेरिका के लिए चिंता का विषय थी। 

जिसके जवाब में अमेरिका ने एक बड़ा दांव खेला और पाकिस्तान को एक परमाणु शक्ति संपन्न देश बनवा दिया। जिसकी मदद से अमेरिका भारत की शक्ति को इस क्षेत्र में संतुलित करना चाहता था। दूसरी तरफ अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत संघ को भगा देना चाहता था, जिसके लिए उसने पाकिस्तान को परमाणु हथियार भी बनाने की छूट दे दी।  इसके अलावा एक दूसरा पहलू भी था जिससे पाकिस्तान को परमाणु हथियार मिले। सोवियत संघ ने जैसे ही अफ़ग़ानिस्तान के युद्ध से अपने हाथ पिछे लिए थे और सोवियत संघ तब भी भारतीय उपमहाद्वीप में सर्व शक्तिशाली बना रहा था। जिसका कारण भारत USSR  के पाले में था। 

पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम पर चीन का हाथ

पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम में बहुत बड़ी मदद चीन ने भी की थी क्यों कि चीन भारत को अपना एक शत्रु देश मान रहा था। जिसके लिए चीन ने पाकिस्तान को यूरेनियम संवर्धन और 2 परमाणु हथियार के लिए ग्रेड यूरेनियम भेजी। इसके अलावा चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता देंग शियाओपिंग ने पाकिस्तान की वित्तीय और सैन्य सहायता के लिए अमेरिका को मना लिया था। जिसके लिए सोवियत संघ का डर दिखाया। उन्होंने अमेरिका से कहा था कि भारत इंदिरा गांधी के नेतृत्व में एक सोवियत संघ का  एक मुख्य सहयोगी बनने के कगार पर है। उस कम्यूनिस्ट चीन का सोवियत संघ के साथ सीमा से संबंधित विवाद था, जिस वजह से वह एक अमरीकन मित्र की तरह पेश आ रहा था।

अमेरिका का दांव उलटा पड़ा

अमेरिका ने भारत की शक्ति को संतुलित करने के लिए पाकिस्तान को परमाणु हथियार प्राप्त करने दिए थे, लेकिन  जब पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के जनक एक्यू खान ने अमेरिका और भारत विरोधी देशों उत्तर कोरिया, लीबिया और ईरान को यूरेनियम संवर्धन की तकनीक को पाकिस्तान समर्थित ब्लैक मार्केट में बेचना शुरू की। तब अमेरिका के होश उड़ गए और अमेरिकी दवाब के चलते पाकिस्तान को 2004 में एक्यू खान को गिरफ्तार करना पड़ा। लेकिन जल्द ही परवेज मुशर्रफ ने उन्हें माफ़ी दे दी और 2009 तक घर में ही कैद रखा गया। 

अफ़ग़ानिस्तान में तालीबान के उदय से पाकिस्तान में हालात बेहद गम्भीर बन गए हैं और अमेरिका को अब डर लग रहा है कि कहीं पाकिस्तान के परमाणु हथियार तालीबान या किसी दूसरे आतंकी संगठन के हाथों न लग जाए।

पत्रकार एड्रियन लेवी और कैथरीन स्कॉट का खुलाशा

एक पत्रकार एड्रियन लेवी और कैथरीन स्कॉट ने अपनी पुस्तक "डिसेप्शन" (Deception) में खुलासा किया है कि खान के काले बाजार को सत्तारूढ़ सैन्य समूह का समर्थन प्राप्त था और उन्होंने इसे अपनी विदेश नीति के हिस्से के रूप में भी बनाया था। पाकिस्तानी सेना ने उत्तर कोरिया को परमाणु हथियार बनाने की तकनीक दी और इसके बदले में बैलेस्टिक मिसाइल की तकनीक प्राप्त की है। पकिस्तान को गौरी मिसाइल उत्तर कोरिया की तकनीक पर आधारित है।

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