भारत ने चीन को श्रीलंका की तरह नेपाल में भी पीछे धकेलना शुरू कर दिया। इसमें बिजली भारत का हथियार बनेगा।

भारत ने नेपाल में चीनी प्रभाव को कम करने के लिए सबसे बड़ी चाल चल दी है और इसमें भारत का सबसे बड़ा हथियार बिजली बनने जा रही है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि नेपाल अपने उपभोग से अधिक बिजली का उत्पादन करता है। इसका सबसे बड़ा कारण नेपाल में जल विद्युत विकास की अपार संभावनाएं और वहां की सरकार भी बिजली निर्यात कर अरबों डॉलर कमाना चाहती है। क्योंकि नेपाल में भारत की तरह कोई बड़ी इंडस्ट्री नहीं है। लेकिन वह जल विद्युत को एक इंडस्ट्री के तर्ज़ पर विकसित करना चाह रहा है।


भारत सरकार ने नेपाल में जल विद्युत परियोजनाओं के लिए बड़ी मात्रा में निवेश किया है। जिससे नेपाल ने अपने देश में कई जल विद्युत परियोजनाओं  का विकास किया और उसने 2019 में पहली बार इंडियन एक्सचेंज एनर्जी के तहत् भारत को 39 मेगा वॉट विद्युत का निर्यात किया। क्यों कि भारत के पीएम नरेद्र मोदी 2014 में नेपाल गए थे। जहां उन्होंने भारत नेपाल एनर्जी समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। तभी से भारत ने नेपाल को कई अरब रूपए जल विद्युत परियोजनाओं के विकास के लिए दिए थे। 

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लेकिन अब नेपाल की जल विद्युत परियोजनाओं में चीनी कंपनियों का भी प्रभाव बढ़ने लगा है। जिनमें ज्यादातर हिस्सा चीन के बिजली ढेकेदारों का है। यहीं कारण है कि भारत चीन निर्मित जल संयंत्र से विद्युत नहीं खरीदेगा। हालाकि यह बात सीधे तौर पर भारत सरकार की ओर से नहीं कहीं गई है। इस बात को भारतीय खरीदारों ने नेपाल के आपूर्तिकर्ताओं के सामने उठाया है। 

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भारत सरकार चीन की कंपनियों द्वारा उत्पादित बिजली को बिल्कुल नहीं खरीदना चाहेगी। क्योंकि अगर हम चीन द्वारा पोषित बिजली परियोजनाओं से बिजली खरीदतें हैं। तो इसका बड़ा लाभ चीनी कंपनियों के पास भी जायेगा और धीरे धीरे वहां चीन ओर ज्यादा मजबूत होता जायेगा। लेकिन जब भारत ने ऐसी परियोजनाओं से बिजली नहीं लेना का ऐलान कर दिया है तो इससे चीन को नेपाल में झटका लगना तय है। क्योंकि भारत ही उपमहाद्वीप में ऐसा देश है। जो नेपाल की बिजली की बड़ी मात्रा में खरीद सकें। जबकि चीन के तिब्बत क्षेत्र में बिजली की ज्यादा मांग ही नहीं है। 


अभी हाल ही में भारत ने श्रीलंका में चीनी प्रभाव को कम किया है। हालाकी श्रीलंका में चीनी प्रभाव को कम करने के लिए भारत को कई बिलियन डॉलर खर्च करने पड़े। अभी भारत ने श्रीलंका को 500 मिलियन डॉलर तेल आपूर्ति के लिए दिए। इसके अलावा 1.5 बिलियन डॉलर ओर देने जा रहे हैं। इन सब घटनाओं से लग रहा है कि भारत अपने क्षेत्र में चीन को पीछे धकेलने कुछ हद तक कामयाब हो रहा है। हालाकि यह भी सच्चाई है कि भारत अकेले ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। इसलिए भारत को अमेरिका, जापान और दूसरे पश्चिमी देशों की मदद लेनी चाहिए। उनको इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश करने को मानना चाहिए। 

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