श्रीलंका दिवालियापन के कगार पर पहुंच गया, विदेशी मुद्रा भंडार भी खत्म हों रहा।

श्रीलंका भारत के दक्षिण भाग में स्थित है, जो चारों तरफ से समुद्र से घिरा है। जिसकी राजधानी कोलंबो है। इन दिनों यह छोटा सा बौद्ध देश कंगाली के मुहाने पर खड़ा हैं। क्योंकि श्री लंका एक पर्यटन आधारित देश है और उसकी अर्थव्यवस्था में ज्यादातर हिस्सा पर्यटन से ही आता है। 

प्वाइंट टू प्वाइंट

 1.2019 के बाद, श्रीलंका बुरे दौर में चला गया

2. श्रीलंका के वर्तमान आर्थिक हालात

3. श्रीलंकाई भुखमरी के कगार पर

 

2019 के बाद, श्री लंका में बुरे दौर की शुरुआत

अगर देखा जाए तो श्री लंका में 2019 से पहले आर्थिक स्थिति ठीक थीं और आर्थिक गतिविधियां भी सही चल रही थी। लेकिन चीन के वुहान से निकले वायरस ने श्री लंका का बजट बिगाड़ दिया और फ़िर चीन के कर्ज़ जाल में फंसकर रह गया। जब श्री लंका चीन का कर्ज़ वापस नहीं कर पाया तो उसने हंबनटोटा बंदरगाह श्री लंका से 99 वर्षों के लिए ले लिया।

हां अगर चीन से वायरस दुनिया में नहीं आता। तो यह देश इतनी सारी समस्याओं में घिरा नहीं होता। कोविड 19 से पहले , श्री लंका का पर्यटन क्षेत्र बहुत अच्छा कर था। जिससे बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होती थीं। 

श्रीलंका के वर्तमान आर्थिक हालत

इस समय श्री लंका की कुल जीडीपी 84.532 अरब डॉलर है। जबकि कर्ज़ 64 अरब डॉलर (2016 के अनुसार) के क़रीब है। जबकि इस देश ने चीन से 5 बिलियन डॉलर का कर्ज ले रखा है। जिसमें 1 अरब डॉलर पिछले साल ही लिया है। 

इसी के साथ, श्री लंका को वर्ष 2022 में करीब 7.3 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज चुकाना है। इसके अलावा इंटरनेशनल सावरेन कर्ज़ (International Sovereign Debt) की 50 करोड़ डॉलर की किस्त भी वापस करनी है।  जबकि श्री लंका का विदेशी मुद्रा भंडार अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच चुका है। इस समय लगभग 1,587 मिलियन डॉलर विदेशी मुद्रा भंडार है।  जिससे साफ हो जाता है कि यह देश जल्द आर्थिक तौर पर कंगाल हो जायेगा। क्योंकि इस समय श्री लंका में उच्च मुद्रास्फीति 12.1 % पर पहुंच गई है, जो पिछले महीने 9.9% ही थी। 

श्रीलंकाई भुखमरी के कगार पर

श्री लंका की आर्थिक स्थिति का आकलन, इस बात से किया जा सकता है कि श्रीलंका के पर्यटन क्षेत्र में काम करने वाले  2,00,000 लोगों की नौकरियां चली गई है और करीब 5,00,000 लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गए हैं। हालाकि इन हालातों के लिए गोटाबाया राजपक्षे की सरकार भी जिम्मेदार है। क्योंकि  पिछले साल ने कृषि क्षेत्र में रासायनिक खादों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया और किसानों को जैविक खेती करने को कहा। लेकिन इसका बहुत ही घातक प्रभाव पड़ा। श्री लंका में बड़े पैमाने अनाज और खाद्यान्य चीजों की कमी हो गई थी। जिससे गोटाबाया राजपक्षे की सरकार को राष्ट्रीय आपातकाल भी लगाना पड़ा था। हालाकि वह तरीका ज्यादा सफल नहीं हुआ और हालात वहीं के वहीं हैं।

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