नाजियों के बर्लिन ओलंपिक 1936 और कम्युनिस्ट सीसीपी के बीजिंग ओलंपिक 2022, समानताएं यहूदियों और उइगुर मुस्लिमों, तिब्बतियों का सामूहिक नरसंहार

बर्लिन ओलंपिक खेल '3 जुलाई, 1936' में हुए थे। जिन्हें दुनिया नाज़ी खेलों के नाम से जानती है। इसका कारण जर्मन तानाशाह हिटलर की यहूदी विरोधी और जर्मन जाति की श्रेष्ठता जैसे हीन सोच थीं। क्योंकि वह सिर्फ़ जर्मन जाति के लोगों को ही श्रेष्ठ मानता था। उसके लिए यहूदी कीड़े मकोड़ों की तरह थे। तभी तो उसने करोड़ों यहूदियों को अपने जर्मन यातना शिविरों में मौत के घाट उतरवा दिया। जिनमें उसने छोटे छोटे बच्चे और महिलाओं को भी नहीं बख्शा था।


इसी को आधार बनाकर मित्र राष्ट्रों जैसे यूनाइटेड किंगडम , फ्रांस , स्वीडन , चेकोस्लोवाकिया , नीदरलैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका ने बर्लिन ओलंपिक का डिप्लोमेटिक बहिष्कार किया था। ये सभी देश ओलंपिक को बर्लिन के बजाय कहीं ओर करवाना चाहते थे।  

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लेकिन बर्लिन ओलंपिक खेलों के बहिष्कार से ही दुनिया के लिए एक महातबाही भी  निकली। जिसका वास्तविक रूप 1 सितंबर 1939 को द्वितीय विश्व युद्ध के रूप में प्रकट हुआ। जिसका अंत जर्मन तानाशाह हिटलर के अंत के साथ 2 सितंबर 1945 को हुआ। 

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दुनिया के इतिहास में बर्लिन ओलंपिक खेलों का बहिष्कार पहला मामला था। ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया था कि ओलंपिक खेलों का बड़े पैमाने पर दूसरे देश बहिष्कार करें।

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अब बीजिंग ओलंपिक 2022 चीन में हों रहें हैं। लेकिन दुनिया के ताकतवर देश बर्लिन ओलंपिक की तरह बीजिंग ओलंपिक का भी डिप्लोमेटिक तरीके से बहिष्कार कर रहे हैं। यहां बहिष्कार के कारण भी बर्लिन ओलंपिक के समान ही हैं। क्योंकि बर्लिन ओलंपिक के समय हिटलर ने यहूदियों का नरसंहार किया था और बीजिंग ओलंपिक के समय उइगुर मुस्लिमों और तिब्बतियों का सामूहिक नरसंहार हो रहा है। शिंजियांग प्रांत के यातना शिविरों में लाखों मुसलमानों पर अत्याचार किए जा रहें हैं। जहां बंधुआ मजदूरों की तरह उइगुर मुस्लिमों से काम लिया जा रहा है। 

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चीन के तानाशाह द्वारा दूसरे देशों की जमीन हड़पी जा रही हैं। दूसरे देशों के अधिकार क्षेत्र ( दक्षिण चीन सागर) को ताकत के दम पर अपना क्षेत्र बताया जा रहा है। आज चीन का हर पड़ोसी उसके विस्तारवादी रवैया से नाराज़ है। 

यहीं कारण हैं कि आज दुनिया के लोकतान्त्रिक देश बीजिंग ओलंपिक खेलों का डिप्लोमेटिक बहिष्कार कर रहें हैं। इसमें शुरुआत अमेरिका ने उइगुर मुस्लिमों के मानवाधिकारों से हुईं। इसके बाद पश्चिमी देशों ने भी अमेरिका का साथ दिया। जिनमें इंग्लैंड, कनाडा और जर्मनी जैसे बड़े देश शामिल हैं।

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लेकिन इसमें भारत शामिल नहीं हुआ था। भारत ने जून 2020 की गलवान वैली की खूनी झड़प के बाद भी बीजिंग ओलंपिक का समर्थन किया था। लेकिन जब चीन ने गलवान वैली के जिम्मेदार सैनिक को बीजिंग ओलंपिक का मशाल वाहक बनाया। तब भारत ने इसे गंभीरता से लिया और बीजिंग ओलंपिक का डिप्लोमेटिक बहिष्कार करने का ऐलान कर दिया। इसी आधार पर भारत से बीजिंग ओलंपिक के उद्घाटन और समापन समारोह में कोई राजनयिक शामिल नहीं होगा। 

इसी आधार पर दुनिया के टॉप पत्रकार मान रहें हैं कि दुनिया बड़ी तेजी से दो धड़ों में बटती जा रही है। एक तरफ़ अमेरिका और उसके मित्र देश शामिल हैं। दूसरी तरफ चीन और उसके मित्र देश हैं। जिस तरह से बर्लिन ओलंपिक 1936 के बाद दुनिया ने सेकंड विश्व युद्ध देखा। इसी कारण दुनिया में भय उत्पन्न हो रहा है कि कहीं दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर तो नहीं खड़ी है। हालाकि वर्तमान स्थिति में कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है। जिससे पूरी दुनिया में शांति स्थापित की जा सकें। 

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रूस यूक्रेन विवाद कभी भी तीसरे विश्व युद्ध का बिगुल बजा सकता है। दूसरी तरफ चीन ताईवान विवाद भी तीसरे विश्व का प्रमुख कारण बन सकता है। क्योंकि अगर चीन ताईवान पर हमला कर उसे चीन में मिलाना चाहेगा तो अमेरिका और उसके मित्र देश ताईवान की रक्षा करने आवश्य आयेंगे। जिनमें भारत भी हो सकता है।

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चूंकि दुनिया में आम आदमी युद्ध नहीं चाहता है। फिर भी इतिहास अपने आप को एक बार फिर दोहरा है। बस फ़र्क इतना है कि पहले नाज़ी जर्मनी के बर्लिन ओलंपिक 1936 थे और अब सीपीपी बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक 2022 हैं। 

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