भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यूक्रेन की बजाय रूस के पक्ष में बयान दिया।

अमेरीका ने यूक्रेन मुद्दे पर रूस को घेरने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा में खुली बहस कराने के लिए मिटिंग बुलाई थी। जिसमें यूएनएससी के सभी स्थाई और अस्थाई देशों को बहस करने के लिए वोट देना था। इस पर रूस भी राज़ी हो गया था।  


अमेरीका और रूस ने अपनी अपनी राजनयिक शक्ति का उपयोग किया। हालाकि इसमें अमेरीका पश्चिमी देशों की बदौलत जीत गया। नॉर्वे, फ्रांस, यूएस, यूके, फ्रांस, आयरलैंड, ब्राजील, मैक्सिको सहित अन्य सभी 10 परिषद सदस्यों ने बैठक के पक्ष में मतदान किया। रूस और चीन ने बैठक के खिलाफ मतदान किया। इसके अलावा भारत , केन्या और गैबॉन यूएनसीसी की मतदान प्रक्रिया के दौरान अनुपस्थित रहे। भारत के पास केवल तीन विकल्प थे। जिसमें एक पूरी तरह से अमेरिका का साथ देना या पूरी तरह से रूस का साथ देना। लेकिन भारत ने इन दोनों विकल्पों का चुनाव न करके अनुपस्थित रहना ही ठीक समझा। क्योंकि भारत को रूस और अमेरिका दोनों की बहुत जरूरत है। 


इकोनॉमिक्स टाईम्स

भारत यूक्रेन मुद्दे पर UNSC में मतदान प्रक्रिया के दौरान दूर रहा था। लेकिन जब अमेरिका के प्रस्ताव को 10 मतों से जीत प्राप्त हुईं। तब भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुछ न कुछ बोलना ही पड़ता। क्योंकि जब से रूस यूक्रेन विवाद ने गम्भीर रूप धारण किया है। तब से भारत की ओर से कोई बयान नहीं आया था। किंतु यूक्रेन मुद्दे पर यूएनएससी में चर्चा के दौरान भारत को बोलना ही पड़ा। इसमें सबसे खास बात है कि भारत ने शब्दों के मायाजाल से रूस का ज्यादा पक्ष लिया। 

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भारत ने यूएनएससी की बहस में कहा कि यूक्रेन और रूस को शांतिपूर्ण बातचीत के माध्यम से तनाव में तत्काल कमी लाने का आह्वान किया। भारत के अगले कुछ शब्द रूस की ओर झुकाव को दर्शाते हैं। भारत ने रूस का पक्ष लेते हुए कहा कि "सभी देशों के वैध सुरक्षा हितों" को ध्यान में रखा जाना चाहिए। क्योंकि रूस अमेरिका से लिखित में एक आश्वासन मांगता है कि वह यूक्रेन को नाटो का सद्स्य नहीं बनायेगा। किंतु अमेरिका ने रूस की मांग को ठुकरा दिया। जबकि रूस को डर है कि कहीं यूक्रेन नाटो का सद्स्य बन गया तो सभी पश्चिमी देश काला सागर तक पहुंच जायेंगे। 

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भारत ने यूक्रेन पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की खुली बैठक में रूस के साथ बड़े पैमाने पर गठबंधन किया, और कहा कि शांतिपूर्ण बातचीत के माध्यम से तनाव में तत्काल कमी का आह्वान करते हुए "सभी देशों के वैध सुरक्षा हितों" को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

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यूक्रेन की स्थिति पर चर्चा करने के लिए सुरक्षा परिषद की बैठक हुई।  बैठक से पहले, रूस, एक स्थायी और वीटो-धारक सदस्य, ने यह निर्धारित करने के लिए एक प्रक्रियात्मक वोट का आह्वान किया कि क्या खुली बैठक आगे बढ़ सकती है।  रूस और चीन ने बैठक के खिलाफ मतदान किया जबकि भारत, गैबॉन और केन्या ने भाग नहीं लिया।  नॉर्वे, फ्रांस, यूएस, यूके, फ्रांस, आयरलैंड, ब्राजील, मैक्सिको सहित अन्य सभी 10 परिषद सदस्यों ने बैठक के पक्ष में मतदान किया।

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रूस को भारत कभी नाराज़ नहीं करना चाहेगा। क्योंकि भारत रूस की दोस्ती समय की कसौटी पर खरी उतरी है। जबकि अमेरिका पर पुरी तरह से विश्वास नहीं किया जा सकता है। हालाकि अब दुनिया बदल रही है और देशों के दुश्मन भी बदल रहें हैं। अमेरीका और पश्चिमी देश भारत के घनिष्ठ मित्र हैं और सभी का प्रमुख दुश्मन वामपंथी चीन है। यहीं कारण हैं कि भारत और अमेरिका चीन के मामले पर एक राय रखते हैं और दोनों को एक दूसरे के साथ की जरूरत है। ताकि विस्तारवादी चीन से सही ढंग से निपटा जा सकें। 

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