1991 के बाद, नाटो द्वारा रूस की सीमाओं का घेराव, जैसे बांग्लादेश में चीनी सैन्य अड्डा का बन जाना

नाटो सैन्य संगठन 4 अप्रैल 1949 को सोवियत संघ के फैलाव को रोकने के लिए बना था। तब इसके सद्स्य देशों की संख्या 12 थी लेकिन 1991 के बाद इसके सदस्यों की संख्या 30 तक पहुंच गई। इन 30 देशों में एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया भी नाटो के सद्स्य बन गए। जिस नाटो को नॉर्थ अटलांटिक संधि संगठन कहा जाता है। वह पूर्व की ओर अपना विस्तार करता गया। पूर्व सोवियत संघ के देशों को अपने में मिला लेने के बाद, वह यूक्रेन को भी नाटो में शामिल होने के लिए उकसाने लगा। इसमें साफ़ तौर पर अमेरीका की चाल थी। जो रूस को हमेशा दबाए रखना चाहता है।


अमेरीका ने रूस पर हमेशा अपनी शक्ती का बेजा इस्तेमाल किया। इसी बेजा इस्तेमाल के कुछ उदाहरण हम आपको देगें और यह भी बताएंगे कि अमेरीकी युद्धों से धरती कैसे बर्बाद हो गई।

1. सोवियत संघ के बिखरने के बाद भी नाटो का बने रहना।

जिस नाटो का गठन सोवियत संघ को रोकने के लिए हुआ था। वह उसके टूटने के बाद भी बना हुआ है। जिसमें अमेरिका की चाल निहित है, वह कभी भी रूस को आर्थिक पर आगे नहीं बढ़ने देना चाहता है। यूएस ने यूक्रेन को रूस के खिलाफ़ हमेशा भड़काया और रूस का डर दिखा कर नाटो की सदस्यता लेने को कहा। जबकि रूस के आक्रमण के बाद वह यूक्रेन की ओर से लड़ने को तैयार नहीं हैं।

अमेरीका ने नाटो की मदद से यूरोप को अपने नियन्त्रण में रखा है। जिसकी सहायता से वह अपनी मनमर्ज़ी कर रहा है। इसी का परिणाम रूस पर महाविनाशक आर्थिक प्रतिबंध हैं। जिसकी सहायता से वह कभी भी रूस को आर्थिक तौर पर आगे बढ़ने ही नही देना चाहता है।

2. रूसी हथियारों पर प्रतिबंध

जब रूस ने 2014 में क्रिमिया पर अपना कब्ज़ा किया था तब अमेरिका ने उस पर कठोर सैन्य प्रतिबंध लगाएं थे। लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यूएस और पश्चिमी देशों ने तेल और गैस पर आर्थिक प्रतिबंध नहीं लगाए। क्योंकि इसमें यूरोपीय देशों का नुकसान होता। दूसरी तरफ रूसी हथियाराें पर प्रतिबंध से अमेरिका को फायदा होता है। अब वह हथियारों का अकेला बड़ा खिलाड़ी बचा था। रूस से हथियार खरीदने बालों को अमेरिका प्रतिबंधों (CAATSA Sanction) से होकर गुजरता है।

3. दुनिया भर में अमेरीकी युद्ध

जो अमेरिका आज पुतिन को युद्ध अपराधी बता रहा है। वह खुद सबसे बड़ा युद्ध अपराधी है। उसने पूरी दुनिया में सेकंड विश्व युद्ध के बाद कई युद्ध लड़े हैं। जिसमें लाखों लोग मारे गए और करोड़ों लोग विस्थापित हुए थे।

अफगानिस्तान में युद्ध

(2001-2021) आतंकवाद और अफगानिस्तान संघर्ष
अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में 2001 में आया था, जब ओसामा बिन लादेन ने यूएस पर 26/11 का हमला किया था। अमेरीकी युद्ध के समय अफगानिस्थान पर तालिबान की सरकार थी। लेकिन 20 सालों के बाद, एक बार फिर उन्ही की सरकार आ गई। लेकिन इन 20 सालों में लाखों अफगानी लोग मारे गए और लाखों लोग विस्थापित हुए। जबकि परिणाम कुछ नहीं निकला।

यमन में अमेरिकी हस्तक्षेप (2002-वर्तमान)

अमेरिका यमन युद्ध में भी सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य अभियान में शामिल रहा था। यमन में अमेरिका के शामिल होने के कारण आतंक पर युद्ध का हिस्सा , यमन में अल-कायदा विद्रोह , यमनी गृहयुद्ध और यमन में सऊदी अरब के नेतृत्व वाला हस्तक्षेप थे।
स्थान: यमन

इराक युद्ध पर यूएस आक्रमण

(2003-2011) आतंकवाद के नाम पर और परमाणु कार्यक्रम के आधार पर अमेरीकी आक्रमण। अमेरिका ने इराक पर यह कहते हुए हमला किया था कि सद्दाम हुसैन परमाणु हथियार बनाने का प्रयास कर रहा है। लेकिन अमरीका की यह बात एकदम झूठी निकली।

स्थान: इराक

सोमाली गृहयुद्ध में अमेरिकी हस्तक्षेप

(2007-में) सोमाली गृहयुद्ध का यूएस हिस्सा बना , सोमाली गृहयुद्ध और आतंकवाद के नाम पर यूएस का युद्ध।
स्थान: सोमालिया और पूर्वोत्तर केन्या

लीबिया में यूएस व अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप  (2011)

लीबिया संकट का हिस्सा और पहला लीबिया गृहयुद्ध में अमेरीकी सैन्य बलों की गम्भीर सैन्य कार्रवाई। जिसमें हजारों लोग मारे गए और लाखों लोग बेघर हुए।

ईराक में अमेरिकी का हस्तक्षेप

इराक को जीत लेने के बाद, अमेरिका वहां से निकल भागा था। लेकिन 2013 तक वहां इस्लामिक स्टेट आतंकी संगठन ने कब्ज़ा कर लिया। जिसके बाद अमेरिका को वहां फिर जाना पड़ा।
तब से लेकर आज भी अमेरिका (2014-2022) के बीच ऑपरेशन ईराक में ही बैठा है। वहां ईरान और अमेरीका की आपसी लड़ाई चल रही है।

वियतनाम युद्ध

अमेरिका जिस भी युद्ध में कूदा था, उनमें से एक भी जीत नहीं पाया। उन्हीं में वियतनाम युद्ध भी शामिल है। जो अमेरिका के लिए यह एक वैश्विक वेइज्जती का कारण बनी थी।
वियतनाम युद्ध दिसंबर 1956 से अप्रैल 1975 तक चला था। इस युद्ध में में नॉर्थ वियतनाम के साथ कम्युनिस्ट समर्थक देश थे और  साउथ में वियतनाम की ओर से कम्युनिस्ट विरोधी अमेरिका और उनके सहयोगी लड़ रहे थे। अमेरिका ने अपने आपको लोकतन्त्र का हितैषी दिखाने के लिए  9 फरवरी 1965 को वियतनाम में सेना उतार दी। यहीं से अमेरिका की न जीतने वाली जंग की शुरुआत हुई। यहां से अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान की भांति बड़ी शर्मिंदगी से निकलना पड़ा।

अमेरिका आज रूस को युद्ध अपराधी बताने पर तुला है। लेकिन वह खुद अपने युद्ध अपराध भूल जाता है। दुनिया भी उससे सवाल नहीं पूछती है। क्योंकि अमेरिका के लिए मानवाधिकार के मापदंड अलग से तय किए जातें हैं और रूस के लिए अलग से।

दुनिया अमेरिका से यह नही पूछती है कि यूएसएसआर के खात्मे के बाद भी नाटो रूस को क्यों घेर रहा है। अमेरिका क्यों रशियन अर्थव्यवस्था को खत्म करना चाहता है। अमेरिका ने ईराक में हमला किया तब उसने कई थर्मोबेरिक बॉम्बो का उपयोग किया। लेकिन तब किसी ने कुछ नहीं किया। पश्चिमी देशों की जनता ने तब रोना नहीं रोया, जब ईराक, यमन, सीरिया, लेबनान, लीबिया और अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी हमलों से लाखों लोग मारे गए और करोड़ों बेघर हुए। जब आज रूस अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लड़ रहा है। वह सिर्फ़ इतना चाहता है कि यूक्रेन नाटो में शामिल न हो।
कोई भी देश नहीं चाहता है कि उसकी सीमा पर उसका दुश्मन आकर बैठ जाए। यहां इस बात को इस तरह समझ सकते हो कि यदि चीन बांग्लादेश या श्रीलंका में अपने सैन्य बेस कैंप बना ले। तब क्या भारत शांत बैठा रहेगा। तो मेरा जबाव नहीं में होगा। भारत भी कुछ न कुछ कदम जरूर उठाता।

यह युद्ध अमेरिका के लिए एक अवसर बन कर आया है। क्योंकि अब दुनिया में रूस का भय फैल गया और यूरोपीय देशों में हथियारों की मांग बढ़ गई। जर्मनी 33 F-35 लड़ाकू विमान अमेरिका से खरीदने जा रहा। इसी तरह कनाडा भी 88 F-35 यूएस से ले रहा है। तो अब बताओ। इस जंग से कौनसा देश फायदा उठा रहा। इसके अलावा भारत भी यूक्रेन रूस युद्ध से बहुत कुछ गंवा रहा है। क्योंकि भारत तेल 85% विदेशों से आयात करता है।

लेकिन वर्तमान में तेल के दाम 100 अमेरीकी डॉलर के पार पहुंच चुके हैं। किंतू यूएस और उसके कुछ सांसद भारत को  कोसने पर लगें हैं। वह भारत को प्रतिबंधों की धमकी दे रहें हैं। इनको यह नहीं दिखता है कि भारत में बढ़ते तेल के दाम भारतीय आम जनता को सीधे प्रभावित कर रहें हैं। जबकि पश्चिमी देश अभी भी रूस से तेल और गैस आयात कर रहें हैं। उनको अमेरिका और उसके सांसद कुछ नहीं कहते हैं। क्योंकि उनको लगता है कि भारत उनका कोई उपनिवेश हो। भारत कोई पाकिस्तान नहीं है। जो अमेरिका और पश्चिमी देशों के दबाव में झुक जाए।

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