धर्म को सरकार से अलग करने वाली फ्रांसिसी क्रांति, जिसने दुनिया को समानता और स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाया

जिस समय यूएस में ब्रिटेन से स्वतंत्रता का संग्राम चल रहा था , उसी समय फ्रांस में क्रांति के बीज बोए जा रहे थे। फ्रांस और अमेरीका में दूर दूर तक समानता नहीं दिखती थी, लेकिन तब भी फ्रांसीसी लोगों पर अमेरीकी क्रांति का बहुत प्रभाव पड़ा।

फ्रैंचक्रांति
तारीख5 मई 1789 - 9 नवंबर 1799 (10 साल, 6 महीने और 4 दिन)
जगहफ्रांस का साम्राज्य
परिणाम 1.प्राचीन शासन का उन्मूलन और संवैधानिक राजतंत्र का निर्माण
 2.सितंबर 1792 में फ्रांसीसी प्रथम गणराज्य की घोषणा
3.लुई सोलहवें के आतंक और क्रूर शासन का अंत
4.नवंबर 1799 में फ्रांसीसी वाणिज्य दूतावास की स्थापना
5. युद्धों का अंत
6. राजा संसद के प्रति जबावदेह
प्रथम फ्रांसीसी गणराज्य22 सितंबर 1792 को
राजा लुई सोलहवें
रानीमैरी
सभा स्टेट्स जनरल

फ्रांस की क्रांति प्रभावशाली रही

जितना अमेरिका की क्रांति ने विश्व को प्रभावित नहीं किया था, उससे अधिक फ्रांस की क्रांति ने विश्व को प्रभावित किया। यहीं कारण है कि फ्रांस की क्रांति से पूरी दुनिया में उथल पुथल मच गई। हर देश पर फ्रांस की क्रांति का प्रभाव पड़ा।

फ्रांस की सामाजिक व्यवस्था

•क्रांति से पूर्व फ्रांस की दशा अन्य यूरोपीये देशों से बहुत बुरी थी। आम जनता को ढेर सारे कष्ट सहने पड़ते थे।

राजा  निरंकुश और युद्ध उन्मादी था, शासक वर्ग और पादरियों को टैक्स से छूट प्रदान थीं। सिर्फ भूमिहीन और निम्न वर्ग के लोग ही टैक्स दिया करते थे। 

•18वीं सदी में फ्रांस को एक शक्तिशली देश माना जाता था। क्योंकि उसने उत्तरी अमेरिका के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया था और इसके अलावा वेस्टइंडीज के द्वीपों पर कब्ज़ा कर रखा था। लेकिन तब भी वह कमजोर हो रहा था।

फ्रांस कीसामाजिक व्यवस्था
वर्ग के प्रकारफ्रांस में तीन वर्ग थे
वर्ग के नाम1.पादरी वर्ग 2. शासकीय वर्ग 3. निम्न व भूमिहीन वर्ग
धार्मिक वर्गपादरी वर्ग,
कर से मुक्त वर्गपादरी और शासकीय वर्ग
कर देने वाली जनसंख्या95%, निम्न वर्ग से
कर न देने वालों का प्रतिशत5%

विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग या एस्टेस्टस

•फ्रांस के इस वर्ग में दो प्रकार के लोग आते थे। जिनमें पहला पादरी वर्ग और दूसरा कुलीन वर्ग शामिल था। पहले पादरी वर्ग में 1 लाख 30 हजार पादरी शामिल थे। दूसरे वर्ग में 4 लाख लोग शामिल थे। 

•इस विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग को सभी करों से मुक्ति प्राप्त थीं। दूसरे वर्ग के लोग प्रशाकीय और सेना के उच्च पदों पर आसीन थे।

•उस समय फ्रांस की कुल आबादी 2 करोड़ 50 लाख के करीब थीं। लेकिन दोनों वर्ग फ्रांस की कुल भूमि का 40% हिस्सा अपने पास रखा हुआ था।

•यह वर्ग अपनी आय जमीदारी व्यवस्था से प्राप्त करता था।

फ्रांस का तीसरा वर्ग

•दोनों अभिजात वर्ग के बाद, शेष फ्रांसीसी आबादी तीसरे वर्ग में आती थी। यह जनसाधारण वर्ग कुल आबादी का  95% था। यह एक पीड़ित वर्ग था, जिसके पास कोई शक्ति नहीं थी।

•यह वर्ग पूर्णतया किसान वर्ग था। फ्रांस की कुल आबादी का 80% किसान थे। यहीं वर्ज थ, जिसके आर्थिक स्थिति बेहद सोचनीय थी।

•लोगों से दासों की तरह काम कराया जाता था। कस्तकारों और बटाईदारों की दशा ठीक नहीं थीं।

•कर भी इसी वर्ग को देना पड़ता था। क्योंकि अधिकतर खेती सामंतो के कब्जे में थीं। 

मध्य वर्ग का उभार

•यह एक नया वर्ग था। जोकि उद्योग धंधों से उत्पन्न हुआ था।  इसमें कस्बों और शहरों में रहने वाले शिल्पी और मजदूर लोग थे। 

•इस वर्ग में लेखक, डॉक्टर, जज, अध्यापक और असैन्य अधिकारी थे।

•इस वर्ग को कोई बड़े अधिकार प्राप्त नहीं थे। किंतू यह एक शक्तिशाली वर्ज था। इस वर्ग को हमेशा अपमानित किए जाता था।

राजतंत्र

•फ्रांस में राजा ही सब कुछ हुआ करता था। वह पूर्ण रूप से तानाशाह और निरंकुश शासक था।

•फ्रांस की क्रांति के समय लुई 16वा शासन कर रहा था, राजा बहुत जिद्दी और मूर्ख था। 

•लुई की पत्नी मैरी एंटोनेत बहुत सुंदर थीं लेकिन वह मूर्ख और खर्चली महिला थीं। वह अपनी सुन्दरता पर बहुत अधिक धन खर्च करती थी। लोगों को दरबार में मनमर्ज़ी के पद दिलाती थी।

•आम सैनिको की स्थिति बहुत दयनीय हो गई थी। राजा को अपनी सेनाओं से कोई  दया भाव नहीं था। अधिक युद्धों ने राज्य की आर्थिक स्थिति बिगाड़ दी।

तर्कवाद और तर्क के युग की शुरूआत

•18वीं सदी में बुद्धि जीवियों का एक वर्ग बन चुका था। जो हर चीज को तर्क की कसौटी पर तोलता था। यहीं कारण है कि इसे तर्क का युग कहते हैं। क्योंकि कोई भी अब पुराने विचारों को सीधे स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

•ईसाई धर्म कहता था कि मानव का जन्म कष्ट भोगने के लिए हुआ है। जबकि दूसरी तरफ  क्रांतिकारी दार्शनिक कहते थे कि मनुष्य का जन्म संसार में सुखी रहने के लिए हुआ है।

•वे लोग ईश्वर को नही मानते थे लेकिन प्रकृति को मानते थे। उनका कहना था कि लोगो को प्रकृति के नियमों को जानना चाहिए। आस्था के नियमों और प्रकृति के नियमों में तर्कपूर्ण वार्तालाप करनी चाहिए।

वाल्टेयर जैसे दार्शनिकों ने पादरियों पर जमकर निशाना साधा। वह नास्तिक नही थे किंतु फिर भी वह कहते थे कि सभी धर्म व्यर्थ हैं, क्योंकि वह तर्क पर आधारित नहीं हैं।

•दूसरे दार्शनिको का विश्वास था कि मानव का भविष्य स्वर्ग में नहीं, बल्कि इसी संसार में है।

•सभी दार्शनिको ने कैथोलिक धर्म की ढेर सारी आलोचनाएं की थी। जिससे लोग चर्च और पदारियों की असलियत समझ गए।

लोकतन्त्र

माटेस्क्कू ने गणतंत्रीय लोकतंत्र का समर्थन किया और सिद्धांतो की रुप रेखा तैयार की।

•रूसो पहला दार्शनिक था, जिसने प्रभुसत्ता और लोकतंत्र का जमकर समर्थन किया। उसका मानना था कि मानव इस संसार में आजाद पैदा हुआ है, परंतु अब वह जंजीरों में जकड़ा हुआ है।

•रूसो ने अपनी पुस्तक "सोशल कॉन्टैक्ट" में लिखा है कि। मानव को स्वतंत्रता, समानता और सुख की गारंटी मिलनी चाहिए। यह उसका प्राकृतिक हक है।

• रूसो साफ़ कहते थे कि अगर कोई राजनीतिक व्यवस्था, जो जनता के सहयोग पर आधारित न हो, तो वह सफल नहीं हो सकती है।

क्रांति का प्रारंभ

•लुई 16वे को 1789 में अधिक पैसों की जरुरत थी। इसलिए वह सामंती सभी स्टेट्स जनरल का अधिवेशन बुलाने पर सहमत हो गया।

•Sabse बड़ी बात यह थी कि 1614 से स्टेट्स जनरल का कोई अधिवेशन नही बुलाया गया। इसी में वह नए कर लगाने की सहमति चाहता था।

•इस सभा में तीनों  वर्गों का  भाग था। लेकिन सभी के रास्ते अलग अलग थे।

•तीसरे वर्ग ने 17 जून 1789 को स्टेट्स जनरल को राष्ट्रीय सभा के रूप में घोषित कर दिया। उनका कहना था कि हमारी आबादी 96% है और अधिकार न के बराबर।

•20 जून को अधिवेशन वाली जगह पर एकत्र हुए। लेकिन हाल पर शाही अंगरक्षकों का कब्ज़ा था।

•तीसरे वर्ग के लोग निश्चित कर चुके थे, इसलिए वे शाही टेनिस कोर्ट में एकत्र हुए और उन्होंने फ्रांस का संविधान बनाना शुरू कर दिया।

•लुई ने सभा भंग करने की कोशिश की। सेना बुला ली गई। दूसरी तरफ जनता के बीच अफवाह फैल गई कि सभा के सदस्यों को बंदी लिया गया। इससे आम जनता में रोष व्याप्त हो गया। हजारों की संख्या में लोग एकत्र होने लगे थे।

•14 जुलाई को बास्तील के कारागार को घेर लिया। लगभग 4 घंटो तक लोगों ने जेल को घेरे रखा और अंत में जेल के फाटक को तोड़ दिया गया। सभी कैदियों को रिहा कर दिया गया।

बास्तील कारागृह फ्रांस में एक निरंकुश शासन का प्रतीक था और इसका पतन निरंकुश शासन के पतन के समान था। इसीलिए फ्रांस हर वर्ष 14 जुलाई को राष्ट्रीय दिवस मनाता है।

•फ्रांस की राष्ट्रीय सभा एक संसद की तरह काम करने लगीं, उसने मानव अधिकारों और  नागरिक अधिकारों की घोषणा पत्र जारी किया। इसी के साथ 14 जुलाई 1700 ई. के पश्चात लुई 16वा नाममात्र का शासक रह गया।

•सभी वर्गों को समान अधिकार दिए गए, प्रेस को स्वतंत्रता प्रदान की गई।

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