चीनी विदेश मंत्री Wang Yi का भारत में ठंडा स्वागत, भारत का कम्यूनिस्ट चीन पर जरा-सा विश्वास नहीं। चीन पर विश्वास करना जैसे आत्महत्या करना

चीनी विदेश मंत्री वांग यी 23 मार्च 2022  को भारत की यात्रा पर थे। गलवान घाटी की घटना के बाद, यह चीनी विदेश मंत्री की पहली यात्रा थी। लेकिन भारत में उनका बेहद ठंडा स्वागत हुआ। उनकी पूरी इच्छा प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी से मिलने की थी, लेकिन पीएम ने उनसे मिलने से साफ़ इंकार कर दिया। वांग की मुलाकात उनके समकक्ष "एस जयशंकर" से हुई। इसके अलावा उनकी मुलाकात भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल से हुई।


"वांग यी" का पाकिस्तान में विवादित बयान

चीनी विदेश मंत्री वांग  भारत आने से पहले पाकिस्तान गए थे। जहां वे इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में शामिल हुए। लेकिन उन्होनें ओआईसी के सम्मेलन में भारत विरोधी बयान दिया। उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का पक्ष लेते हुए कहा कि चीन जम्मू कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन के समर्थन में इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के रुख का समर्थन करता है और पाकिस्तान के मुख्य मुद्दे कश्मीर का भी समर्थन करता है।  

भारत सरकार का चीन को जवाब

भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने "वांग" को जबाव देते हुए कहा कि चीन को भारतीय आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई हक नहीं। भारत ने ताईवान, तिब्बत, शिंजियांग और हांगकांग की ओर संकेत करते हुए चीन से कहा कि भारत भी चीन के  विवादित आंतरिक मामलों पर कुछ नहीं बोलता है। इसलिए चीन को भी भारतीय आन्तरिक मामलों से दूर रहना चाहिए।

भारतीय विदेश मंत्री "एस जयशंकर" ने चीनी विदेश मंत्री के सामने कह दिया कि भारत आशा करता है कि वह एक स्वतंत्र विदेश नीति अपनायेगा। जोकि "वांग " की कश्मीर पर टिप्पणी का जबाव है। 

"वांग ही" की भारतीय यात्रा का उद्देश्य

चीन के विदेश मंत्री भारत में एक उद्देश्य से आए थे। जिसमें चीन भारत सीमा पर शांति स्थापित करना शामिल नहीं था। हां इसको लेकर बातचीत जरूर हुई। लेकिन चीन इसको लेकर अधिक गम्भीर नहीं है। किंतू चीन भारत से व्यापारिक संबंध बढ़ाना चाहता है।  जबकि भारत का चीन को साफ कहना है कि चीन के साथ संबंध  सीमा पर शांति से संबंधित हैं। वहां शांति रहती है तो भारत के चीन से रिश्ते सामान्य हो जायेंगे। 

किंतू चीनी विदेश मंत्री भारत यूक्रेन  मुद्दे को साथ लेकर आए। चीन को यूक्रेन मुद्दे पर भारतीय रूख से बड़ी खुशी हो रही है। क्योंकि वह अमेरीकी और पश्चिमी देशों के दबाव में नहीं आया। भारत का यूक्रेन रूस युद्ध पर तटस्थ रुख है। वह न तो रूस के साथ और न ही यूक्रेन के साथ है। लेकिन हिंद प्रशान्त क्षेत्र में ऐसा नहीं होगा। क्योंकि भारत के लिए यूक्रेन एक अनोखा जगह रखता है।  अगर चीन ताइवान पर रूस की तरह हमला करता है तो भारत अमेरीका और क्वॉड देशों के खेमे में खड़ा होगा और  क्वॉड देश मिलकर चीन का सैन्य ताकत से जवाब देगे। 

भारतीय जनता और सरकार का चीन पर शून्य विश्वास

भारतीय आम जनता और मोदी सरकार चीन पर जरा सा भी विश्वास नहीं करती है। क्योंकि चीन पीठ पर हमला करने वाला देश है। इस पर जिसने विश्वास किया। तो वह समझ ले कि वह अपने लिए एक यमराज तैयार कर रहा है। यानी सीधे सीधे आत्महत्या जैसी स्थिति पैदा करना। भारतीय इतिहास में चीनी धोखे के कई किस्से हैं। सबसे बड़ा किस्सा 1962 का भारत चीन युद्ध है। दूसरा भारत को पड़ोसी देशों के द्वारा घेरना है। तीसरा जून 2020 की गलवान घाटी की खूनी घटना है। चीन का सबसे बड़ा धोखा पाकिस्तान में कश्मीर पर पाकिस्तान का समर्थन करना है।

अंत में यह निष्कर्ष निकलता है कि भारत को चीन का विश्वास नहीं करना चाहिए।  ऐसा न हो कि हम रूस के चक्कर में चीन की बात मान लें। दूसरी तरफ अमेरीका और क्वॉड के देश भारत से नाराज़ हो जाएं। 

दूसरी तरफ चीन यह बात अच्छी तरह से समझ गया है कि कुछ वर्षों में भारत की दुनिया में ताकत बहुत अधिक बढ़ गई है। चीन अमेरिका को हटाकर तब तक विश्व महाशक्ति नहीं बन सकता है। जबतक भारत चीन के समर्थन में न उतर आए या वह यूक्रेन मुद्दे की तरह अपनी विदेश नीति तटस्थ बनाए रखे। 

लेकिन भारत यूएस और क्वॉड देशों का साथ नहीं छोड़ेगा। हां भारत पाकिस्तान की तरह अमेरिका की हर बात आंख बंद करके नहीं मानेगा। भारत अमेरीकी संबंध बराबरी और आपसी सहयोग पर आधारित होगें। जिसमें चीन को काउंटर करना प्रमुख होगा।


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