यदि चीन LAC को पार करता, तो रूस भारत को चीन से बचाने नहीं आने वाला, अमेरीकी डिप्टी एनएसए दलीप सिंह ने दिल्ली में साफ़ साफ़ कहा

यूक्रेन रूस युद्ध में दुनिया बड़ी तेजी से बदल रही है। जिससे अब हर देश खुलकर अपने हितों के बारे में दूसरे देशों से बात कहने लगे। यहीं हाल अमेरिका का है, वह रूस को किसी भी तरह आर्थिक तौर पर बर्बाद कर देना चाहता है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी चुनौती भारत है। क्योंकि विश्व की पांचवी बड़ी इकोनॉमी है और जनसंख्या में दूसरे स्थान पर आता है। इसके अलावा भारत 2028 तक जापान को मात देकर विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जायेगा। 


तभी रूस और अमेरिका किसी भी कीमत पर भारत को अपने पाले में रखना चाहते हैं। अमेरिका को तब रहा नहीं गया जब भारत में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की अधिकारिक यात्रा की घोषणा कर दी गई। उनकी भारत यात्रा 31 मार्च को तय हुई थी। लेकिन अमेरिका ने दो दिन पहले ही अपना उप सुरक्षा सलाहकार दलीप सिंह को भारत भेज दिया। ताकि वह भारत को रूस से कोई भी बड़ी डील करने से रोक सकें। अमेरिका और पश्चिमी देश अच्छी तरह से जानते हैं कि भारत उनके लिए कितना फायदेमंद है। 

दूसरी तरफ अमेरिका भारत की स्वतंत्र और निष्पक्ष विदेश नीति से भी परेशान है। वह रूस मामले में भारत की स्वतंत्र और तटस्थ स्टैंड को पसंद नहीं करता है। इसी झुंझलाहट में  अमेरीकी उप सुरक्षा सलाहकार दलीप सिंह ने दिल्ली में अपने मन की बात बोल दी। उन्होंने कहा कि यदि चीन नियंत्रण रेखा को पार करता है तो इस मामले में रूस भारत की सहायता करने नहीं आने वाला है। सिर्फ़ अमेरिका चीन के खिलाफ़ भारत की मदद करने आयेगा। लेकिन वो यहां भूल गए कि भारतीय सेना चीन का सामना करने के काबिल है। चीन भारत से आमने सामने की जंग कभी नहीं जीत पायेगा। भारत ने चीन को जून 2020 में 'गलवान घाटी' की खूनी घटना से सबक सीखा दिया। 

भारत यूएस की तब बात सुनेगा। जब

हां भारत अमेरिका की बात तब मान जायेगा। जब वह पाकिस्तान के खिलाफ़ बड़ा कदम उठाए। क्योंकि भारत अकेले चीन का सामना कर सकता और उसे हरा भी सकता है। बस अमेरिका को भारत के पड़ोसी एक कट्टरपंथी देश पाकिस्तान के खिलाफ़ कुछ सख्त कार्रवाई करें। जैसे:

1. पाकिस्तान से नाटो का एक महत्वपूर्ण रक्षा सहयोगी का तमगा छीन ले। जबकि रूस इस मामले में पाकिस्तान को भाव भी नहीं देता है। उसने CSTO सैन्य संगठन में पाकिस्तान या चीन को कोई पद नहीं दिया। जबकि यूएस और पश्चिमी देशों ने पाक को नाटो में विशेष स्थान दिया।

2. अमेरिका ने पाकिस्तान को F16 लड़ाकू विमान दिए, अब वह पाकिस्तान से अपने लड़ाकू विमान वापस देने के लिए कहें या उनके लिए पार्ट्स न भेजें। 

3. अमेरिका में पाकिस्तान को मिला विशेष आर्थिक स्टेट्स खत्म हो और यूरोपीय देशों से भी पाकिस्तान GSP स्टेट्स खत्म करने के लिए कहें। 

4. अमेरिका पाकिस्तान पर आंतकवाद फैलाने के लिए सख्त कार्रवाई करें।  क्योंकि आज भारत पाकिस्तान के आंतकवाद से पीड़ित है। वह कहीं जम्मू कश्मीर और कहीं गुजरात में भारतीय जमीन पर अपना दावा करता है।

5. पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक से कर्ज मिलना बंद होना चाहिए।

6. पाकिस्तानी सेना पर यूएस दवाब बनाए। ताकि पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों की सुरक्षा हो सकें।

अगर यह सब काम अमेरिका कर देता है तो भारत भी अमेरिका से बैठकर वैश्विक राजनीति में अमेरिका का साथ देने को तैयार हो जायेगा। क्योंकि तब पाकिस्तान सैन्य तौर पर बेहद कमजोर हो जायेगा और वह भारत के खिलाफ़ कुछ भी करने लायक नहीं होगा। तब हम आसानी से चीन की ओर ज्यादा ध्यान से सकेंगे। 

सिर्फ भारत अमेरिका के लिए सब कुछ करें और अमेरिका भारत के लिए कुछ न करें। तो यह भी हों नहीं सकता है। जबकि सच्चाई यह है कि अमेरिका और पश्चिमी देश ही वे देश हैं। जहां भारत विरोधी लोग ज्यादा पनाह लिए हुए हैं। इसके अलावा भारत को मानवता, फ्रीडम ऑफ इक्वलिटी, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र पर ज्यादा भाषण सुनने को मिलते हैं। जबकि रूस भारत इन मामलों से बिल्कुल दूरी बनाकर रखता है। 

अमेरिका और उसके पश्चिमी मित्र ये वहीं हैं जो भारत के आंतरिक मामलों पर टिका टिप्पणी करते हैं। ब्रिटेन की संसद में भारत के आंतरिक मामलों पर बहस की जाती हैं। जिनमें जम्मू और कश्मीर भी शामिल है। जबकि भारत साफ़ साफ़ कर चुका है कि पूरा जम्मू कश्मीर (POK और अक्साई चिन) भारत का अभिन्न अंग है।

अगर हम रूस की बात करें तो वह भारत में बड़े पैमाने पर परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित कर रहा है। भारत के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा रहा। जिनमें ब्रह्मोस मिसाइल एक अच्छा उदाहरण है। भारत को परमाणु ऊर्जा से बिजली बनानी है तो इसका ईंधन मध्य एशियाई देशों से मिलने वाला है। जबकि इन देशों की विदेश नीति पर रूस का प्रभाव ही है। इसलिए भारत को अधिक लंबे समय में रूस की अधिक जरूरत होगी। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जितनी हमें रूस की जरूरत है। उतनी ही अमेरिका और पश्चिमी देशों की। क्योंकि हमेशा पुराने दोस्तों के साथ साथ नए दोस्त भी बनाने चाहिए। लेकिन इसके लिए अमेरिका को भारत का दिल जीतना होगा। तभी यह संभव हो पायेगा।

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